जम्मू यूनिवर्सिटी (Image- Social Media) 
जम्मू कश्मीर

जम्मू यूनिवर्सिटी में 'जिन्ना' पर संग्राम! सिलेबस में जिन्ना को बताया 'अल्पसंख्यकों का नेता', मचा बवाल!

जम्मू यूनिवर्सिटी के एमए सिलेबस में मोहम्मद अली जिन्ना पर अध्याय को लेकर बवाल। वीसी ने बैठाई जांच कमेटी, एबीवीपी ने हटाने की मांग की। अकादमिक स्वतंत्रता बनाम विवाद की पूरी रिपोर्ट।

अर्पित शुक्ला

Jammu University Jinnah Controversy: जम्मू यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस एमए सिलेबस में पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना पर एक अध्याय को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस विवाद के बाद वाइस चांसलर उमेश राय ने जांच के लिए एक समिति का गठन किया है। समिति की अध्यक्षता फिजिक्स विभाग के प्रोफेसर नरेश पाधा करेंगे और उन्हें छात्रों द्वारा उठाई गई चिंताओं के मद्देनजर सिलेबस की समीक्षा करने का काम सौंपा गया है।

अध्यक्षता में आए विवाद के अनुसार, सिलेबस में जिन्ना को “अल्पसंख्यक और राष्ट्र” नामक एक अध्याय में भारत में अल्पसंख्यकों का नेता के रूप में दिखाया गया है। एबीवीपी के जम्मू-कश्मीर राज्य सचिव सन्नक श्रीवत्स ने इस अध्याय को वापस लेने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि सिलेबस में अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी व्यक्ति को शामिल करना ही है, तो बीआर अंबेडकर या फ्रंटियर गांधी अब्दुल्ला गफ्फार खान जैसे वास्तविक नेता बेहतर विकल्प हैं।

विश्वविद्यालय किसी भी विचारधारा को बढ़ावा नहीं देता

वहीं, पॉलिटिकल साइंस विभाग के प्रमुख बलजीत सिंह मान ने सिलेबस का बचाव करते हुए कहा कि जिन्ना और अन्य विचारकों को शामिल करना अकादमिक दृष्टिकोण से है और यह UGC के मानदंडों के अनुरूप है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वविद्यालय किसी भी विचारधारा को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि छात्रों को आलोचनात्मक मूल्यांकन के लिए विविध दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

2018 में भी हुआ था विवाद

यह पहला विवाद नहीं है। 2018 में भी पॉलिटिकल साइंस विभाग के एक प्रोफेसर ने स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह को आतंकवादी कहने वाली वीडियो क्लिप के कारण विवादित स्थिति पैदा की थी। विवाद के बाद प्रोफेसर को निलंबित किया गया और जांच शुरू हुई थी। बाद में प्रोफेसर ने स्पष्ट किया कि उनका कथन गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया था और वे वास्तव में लेनिन के विचार पढ़ा रहे थे।

इस विवाद ने यह सवाल फिर से उठाया है कि विश्वविद्यालयों में सिलेबस में शामिल ऐतिहासिक और राजनीतिक व्यक्तित्वों के चयन में अकादमिक स्वतंत्रता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।

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