सुप्रीम कोर्ट। इमेज-सोशल मीडिया 
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'चांद और सूरज छोड़कर'...सबकुछ मुफ्त देने का वादा, चुनावी रेवड़ी के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Irrational Freebies : चुनावों से पहले चुनावी रेवड़ियों का वादा करने वाली पार्टियों पर लगाम लगाने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट मार्च में सुनवाई करेगा। यह याचिका 2022 से सर्वोच्च अदालत में दाखिल है।

रंजन कुमार

Supreme Court On Election Freebies : चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियों द्वारा तर्कहीन चुनावी रेवड़ियों का वादा किए जाने के खिलाफ दायर की जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट मार्च में सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। इस याचिका में ऐसे वाले करने वाली पार्टियों का रजिस्ट्रेशन समाप्त करने या चुनाव चिन्ह जब्त करने की मांग की गई है। आज सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच में यह मामला उठाया गया। बेंच ने याचिका पर अगले महीने में सुनवाई शुरू करने के लिए सहमति दे दी।

आज मामले में याचिककर्चा और वकील अश्विनी उपाध्याय ने सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच को बताया कि उनकी जनहित याचिका पर केंद्र और चुनाव आयोग को 2022 में नोटिस जारी किया गया था। अदालत से गुहार लगाई थी कि इस मामले को सुनवाई के लिए जल्द से जल्द लिस्ट किया जाए।

मार्च में करेंगे लिस्ट

अश्विनी कुमार ने कहा कि सूरज और चांद छोड़कर चुनावों के दौरान राजनीतिक दल हर वादा करते हैं। यह भ्रष्ट आचरण के समान है। इस पर देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। आप प्लीज हमें याद दिलाना और अंत में इसका ज़िक्र करना। मार्च में हम लिस्ट करेंगे।

चुनावी प्रक्रिया को करता है नष्ट

सुप्रीम कोर्ट में 25 जनवरी 2022 को तत्कालीन सीजेआई एनवी रमना ने इस केस में केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस देकर जवाब मांगा था। उस दौरान भी बेंच ने इसे गंभीर मुद्दा बताया था। बेंच ने कहा था कि कई बार फ्रीबी बजट रेगुलर बजट से अधिक हो जाता है। याचिका में अदालत से गुहार लगाई गई है कि जनता के खजाने से तर्कहीन चुनावी रेवड़ियों का वादा करना न सिर्फ वोटरों को गलत तरह से प्रभावित करता है, बल्कि न चुनावी लड़ाई में एक तरह का मैदान रह जाता है। पूरी चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता भी नष्ट कर देता है।

कानून बनाने की भी मांग

इस याचिका में केंद्र सरकार को इसके खिलाफ कानून लाने की मांग की गई है। यह भी कहा गया है कि इस तरह की चुनावी रेवड़ियों के नाम पर राजनीतिक पार्टियों की तरफ से वोटरों को प्रभावित करना न सिर्फ लोकतांत्रिक मूल्यों के वजूद के लिए खतरा है, बल्कि यह संविधान की भावना को भी आहत करता है। इसके मुताबिक यह अनैतिक परंपरा सत्ता में रहने को सरकारी खजाने के दम पर मतदाताओं को रिश्व देने के समान है। लोकतांत्रिक सिद्धांतों और प्रक्रियाओं को सुरक्षित रखने के लिए इसे रोकना जरूरी है।

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