AI पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (प्रतीकात्मक इमेज- AI) 
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'अदृश्य और बेहद खतरनाक', AI पर सुप्रीम कोर्ट ने दी बड़ी चेतावनी; बोला- इंसानी दखल है जरूरी

AI Fake Judgments: सुप्रीम कोर्ट ने AI से तैयार फर्जी न्यायिक मामलों पर जीरो टॉलरेंस अपनाते हुए NCLT-NCLAT के फैसले रद्द कर दिया है। कोर्ट ने AI में मानव हस्तक्षेप को अनिवार्य बताया है।

अमन मौर्या

Supreme Court AI Ruling: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बड़ा निर्णय लिया है। कोर्ट ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के उन फैसले को रद्द कर दिया, जिनसे उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा तैयार किए गए फर्जी, आधारहीन और काल्पनिक न्यायिक मामलों का सहारा लिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की सामग्री का न्यायिक फैसलों में इस्तेमाल करने पर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाने की घोषणा करते हुए साफ किया कि न्यायिक फैसलों में इस तरह की झूठे या मनगढ़ंत सामग्री का इस्तेमाल पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

NCLT और NCLAT का फैसला हुआ रद्द

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने 28 अगस्त, 2024 के एनसीएलटी और 11 सितंबर, 2025 को एनसीएलएटी के फैसले को रद्द करते हुए मामले को फिर से मामले को नई सुनवाई के लिए एनसीएलटी के पास भेज दिया। साथ ही दो सप्ताह के भीतर नया फैसला सुनाने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति आलोक अराधे और पी.एस. नरसिम्हा की पीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि एआई से तैयार किए गए झूठे और मनगढ़ंत न्यायिक फैसले के आधार पर दिया गया कोई भी न्यायिक फैसला कानून की नजर में वैध नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि इस तरह का कोई भी फैसला कानून के शासन को कमजोर करता है।

AI में इंसानी हस्तक्षेप जरूरी: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एआई पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एआई न्यायिक प्रक्रिया में मदद कर सकता है, लेकिन इंसानी समझ और सोच की जगह नहीं ले सकता। कोर्ट ने कहा कि फैसला सुनाने की प्रक्रिया में एआई को सहायक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन अंतिम फैसला सुनाने की पूरी जिम्मेदारी न्यायाधीश के हाथ में ही होनी चाहिए। एआई के हर चरण में इंसानी हस्तक्षेप का बने रहना जरूरी है।

फैसलों में AI के इस्तेमाल पर कोर्ट ने जताई चिंता

मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की  पीठ ने कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि एनसीएलटी ने जिन फैसलों का हवाला दिया, असल में उसका कोई आस्तित्व ही नहीं था। कोर्ट ने कानूनी प्रक्रियाओं में एआई के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता जताते हुए कहा कि कोर्ट को फैसला सुनाने के दौरान एआई के इस्तेमाल पर पूरा नियंत्रण बनाए रखना चाहिए।

AI को बताया मिथाइल आइसोसाइनेट जैसा खतरनाक

कोर्ट ने इसे कानून में न्यायिक उदाहरण के रूप में इस्तेमाल करने पर बेहद खतरनाक बताया है। कोर्ट ने कहा कि यह ठीक वैसा ही है जैसे मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव, जोकि अदृश्य होता है, लेकिन चुपचाप बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा देता है। जब तक इसका पता चलता है, तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। कोर्ट ने कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के साथ-साथ न्यायिक फैसलों की विश्वसनीयता को भी कमजोर कर देता है।

कोर्ट ने जजों की दी नसीहत

अधिवक्ता की जिम्मेदारी पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना किसी जांच-पड़ताल के ऐसे फैसलों का हवाला देना किसी भी वकील की पेशेवर जिम्मेदारी के खिलाफ है। इसी तरह, अगर कोई न्यायाधीश अपने फैसले के समर्थन में एआई से तैयार किए गए झूठे या मनगढ़ंत न्यायिक उदाहरणों का इस्तेमाल करता है, तो यह भी एक गंभीर चूक मानी जाएगी।

क्या है पूरा मामला?

बता दें, यह फैसला एसेल इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की निलंबित निदेशक पूजा रमेश सिंह की अपील पर आया। उन्होंने जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड की ओर से दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की धारा 7 के तहत शुरू की गई दिवालियापन की कार्यवाही को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से पेश अधिवक्ता माधवी दीवान ने कहा कि एनसीएलटी ने अपने फैसले में जिन कई न्यायिक उदाहरणों का हवाला दिया था, उनमें से कुछ असल में मौजूद ही नहीं थे। इस दौरान उन्होंने यह भी बताया कि सुनवाई के दौरान कुछ मामलों में एआई से तैयार किए गए पैराग्राफ को गलत तरीके से सुप्रीम कोर्ट का असली फैसला का हिस्सा बताकर पेश किया गया था।

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