सदन में राहुल गांधी। इमेज-एआई 
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राहुल गांधी फिर खाएंगे मात, ओम बिरला को पद से हटाने के लिए क्या कहता है आंकड़ों का खेल?

Lok Sabha Speaker Removal Process : संसद सत्र में मचे हंगामे के बीच विपक्ष लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने की तैयारी में है। बजट सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष में तल्खी बढ़ी हुई है।

रंजन कुमार

Om Birla VS Rahul Gandhi : संसद के बजट सत्र में इन दिनों राजनीतिक पारा अपने चरम पर है। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच तल्खी इस कदर बढ़ गई है कि अब लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि सदन में राहुल गांधी जैसे बड़े नेताओं को बोलने का पूरा मौका नहीं दिया जाता और स्पीकर अक्सर उन्हें टोक देते हैं। इसी नाराजगी को देखते हुए विपक्ष अब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव (मोशन ऑफ रिमूवल) लाने की तैयारी में है।

लोकसभा स्पीकर को हटाना सुनने में जितना सरल लगता है, उसकी संवैधानिक प्रक्रिया उतनी ही जटिल है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत अध्यक्ष को पद से हटाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कुछ अनिवार्य शर्तें हैं। सबसे पहले विपक्ष को कम से कम 14 दिन पहले एक लिखित नोटिस देना होगा। इस नोटिस की स्वीकार्यता के लिए सदन के कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होना जरूरी है। यदि यह शुरुआती बाधा पार हो जाती है, तभी सदन में इस पर चर्चा और वोटिंग कराई जा सकती है।

क्या कहते हैं मौजूदा आंकड़े?

राजनीति भावनाओं से नहीं बल्कि आंकड़ों से चलती है और यहां विपक्ष की राह बेहद मुश्किल नजर आती है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों में से एक खाली होने के कारण सदन की कुल संख्या 542 है। इस हिसाब से बहुमत के लिए 272 वोटों की दरकार है। सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के पास फिलहाल 293 सांसद हैं। यह बहुमत के जादुई आंकड़े से कहीं आगे है। इसके विपरीत विपक्षी इंडिया गठबंधन के पास केवल 234 सांसद हैं। यानी जब तक एनडीए के घटक दल बगावत न करें, तब तक ओम बिरला को पद से हटाना नामुमकिन है।

इतिहास और प्रतीकात्मक राजनीति

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आज तक एक भी ऐसा उदाहरण नहीं है, जब किसी स्पीकर को इस प्रक्रिया के जरिए हटाया गया हो। 1967 में नीलम संजीव रेड्डी, 1987 में बलराम जाखड़ और 2011 में मीरा कुमार जैसी दिग्गज हस्तियों के खिलाफ भी नोटिस आए, लेकिन बहुमत न होने के कारण वे कभी पास नहीं हो सके। साफ है कि वर्तमान परिस्थितियों में विपक्ष का यह कदम केवल एक प्रतीकात्मक विरोध है। यह सरकार और स्पीकर पर दबाव बनाने और अपनी नाराजगी सार्वजनिक करने का एक जरिया मात्र है। वास्तविक सत्ता समीकरणों को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह प्रस्ताव भी इतिहास के उन पन्नों में ही शामिल होगा, जो केवल चर्चा तक सीमित रहे।

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