राघव चड्डा (Image- Social Media) 
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राघव चड्डा पर AAP ने लिया एक्शन, राज्यसभा में उपनेता के पद से हटाया, बोलने पर भी लगी रोक

AAP Rajya Sabha Deputy Leader Change: आप ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में उप नेता के पद से हटाकर अशोक मित्तल को नियुक्त किया है। पार्टी ने सचिवालय से चड्ढा को बोलने का समय न देने का भी अनुरोध किया है।

अर्पित शुक्ला

Raghav Chadha News: आम आदमी पार्टी ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए राघव चड्ढा को राज्यसभा में उप नेता के पद से हटा दिया है। उनकी जगह अब अशोक मित्तल को उप नेता नियुक्त किया गया है।

पार्टी ने इस संबंध में राज्यसभा सचिवालय को आधिकारिक पत्र भी सौंप दिया है। इसके साथ ही AAP ने सचिवालय को यह भी सूचित किया है कि राघव चड्ढा को संसद में बोलने के लिए समय आवंटित न किया जाए।

इस फैसले को पार्टी के अंदरूनी रणनीतिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि इसके पीछे के कारणों को लेकर अभी तक आधिकारिक रूप से विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।

कौन हैं अशोक मित्तल?

डॉ. अशोक मित्तल पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं और देश के प्रमुख शिक्षाविदों में उनकी पहचान है। वे लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) के चांसलर भी हैं, जो भारत की बड़ी निजी यूनिवर्सिटियों में गिनी जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के चलते उन्हें एक प्रभावशाली अकादमिक लीडर माना जाता है, और अब वे राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

पितृत्व अवकाश को कानूनी अधिकार बनाने की मांग

राघव चड्ढा ने हाल के दिनों में संसद में आम लोगों से जुड़े कई अहम मुद्दे उठाए हैं। 30 मार्च को राज्यसभा में उन्होंने पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को कानूनी अधिकार का दर्जा देने की मांग की। उन्होंने कहा कि बच्चों की परवरिश केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह माता-पिता दोनों की साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए।

उन्होंने यह भी बताया कि फिलहाल केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 15 दिन का पितृत्व अवकाश मिलता है, लेकिन निजी क्षेत्र में ऐसा कोई अनिवार्य प्रावधान नहीं है, जबकि देश का बड़ा कार्यबल वहीं काम करता है। राघव चड्ढा ने कई देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कर्मचारियों को लंबी अवधि का पितृत्व अवकाश मिलता है और भारत में भी इस सोच को अपनाने की जरूरत है।

बैंकिंग शुल्क का मुद्दा भी उठाया

इसके अलावा, उन्होंने राज्यसभा में न्यूनतम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि छोटे खाताधारकों पर लगने वाले ऐसे शुल्क को खत्म किया जाए, क्योंकि इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर पड़ता है। उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह के चार्ज वित्तीय समावेशन (financial inclusion) के उद्देश्य के खिलाफ जाते हैं और आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं।

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