कर्नाटक सीएम को लेकर कांग्रेस की बैठक ( कॉन्सेप्ट फोटो ) 
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कर्नाटक कांग्रेस में सब ठीक नहीं! दिल्ली में चल रही बैठकों ने बढ़ाई सियासी हलचल, सिद्धारमैया-DK कौन है भारी?

Karnataka CM Race: कर्नाटक कांग्रेस में सीएम पद को लेकर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच खींचतान तेज हो गई है। दिल्ली में हाईकमान के साथ बैठकों के बाद नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें जोरों पर हैं।

अमन उपाध्याय

Karnataka CM Race Congress Meeting: कर्नाटक की राजनीति में इस समय मंच पर सब कुछ शांत दिख सकता है, लेकिन पर्दे के पीछे सत्ता का एक बड़ा खेल खेला जा रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच का तनाव अब केवल अटकलों तक सीमित नहीं है यह कांग्रेस पार्टी के भीतर एक गहरे सत्ता संघर्ष का रूप ले चुका है।

दिल्ली में हाल ही में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और के. सी. वेणुगोपाल के साथ दोनों नेताओं की अलग-अलग बैठकों ने इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि कर्नाटक में सत्ता-संतुलन को लेकर कोई निर्णायक फैसला लिया जा सकता है।

ढाई-ढाई साल का 'अनकहा' वादा

इस पूरे विवाद की जड़ें साल 2023 के विधानसभा चुनाव परिणामों में छिपी हैं। जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए दोनों दिग्गजों के बीच लंबी खींचतान चली थी, जिसे हाईकमान ने एक समझौते के जरिए शांत किया था। उसी समय से 'ढाई-ढाई साल' के फॉर्मूले की चर्चा हो रही है। जिसे कांग्रेस ने कभी आधिकारिक तौर पर स्वीकार तो नहीं किया, लेकिन पार्टी के भीतर इसे एक अनकहे समझौते के रूप में देखा जाता है,। अब सरकार के तीन साल पूरे होने के करीब आने पर यही वादा फिर से राजनीति के केंद्र में आ गया है।

सामाजिक न्याय का चेहरा

सिद्धारमैया को हटाना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि वे राज्य में अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित समुदायों के गठबंधन का सबसे बड़ा चेहरा हैं। उनकी मुफ्त योजनाएं और सामाजिक न्याय की राजनीति ही कर्नाटक में कांग्रेस की चुनावी ताकत का आधार बनी है। पार्टी का एक बड़ा धड़ा मानता है कि उन्हें पद से हटाना कांग्रेस के सामाजिक संतुलन को बिगाड़ सकता है, जिससे भाजपा के खिलाफ उनकी वैचारिक स्थिति कमजोर हो सकती है।

'संकट मोचक' की छवि

दूसरी ओर डीके शिवकुमार हैं जिनकी ताकत उनके संगठनात्मक नेटवर्क और संसाधनों पर पकड़ में है। 2023 की जीत में उनके योगदान और विधायकों के बीच उनकी लोकप्रियता को नकारा नहीं जा सकता।

हालांकि वे सार्वजनिक रूप से हाईकमान के फैसले को मानने की बात करते हैं, लेकिन उनकी 'संयमित' राजनीति को सत्ता के लिए एक गहरे दबाव के रूप में देखा जा रहा है। हाईकमान की दुविधा यह है कि यदि डीके को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, तो संगठन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ असंतुष्ट हो सकता है।

राजस्थान की गलती दोहराने से बच रही कांग्रेस

कांग्रेस नेतृत्व इस संकट को सुलझाने के लिए फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है, क्योंकि उसे राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच हुए संघर्ष की याद सता रही है। कर्नाटक दक्षिण भारत में कांग्रेस की सबसे मजबूत सरकार है और वे इसे 'मॉडल स्टेट' की तरह पेश करना चाहते हैं। ऐसे में किसी भी सार्वजनिक विवाद को रोकने के लिए सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में लाने या राज्यसभा भेजने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है।

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