Judicial Controversy India: Yashwant Varma ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह फैसला उस बड़े विवाद के करीब एक साल बाद आया है, जिसमें उनके दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास से भारी मात्रा में नकदी मिलने का दावा किया गया था। उनका इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दिया गया है।
यह विवाद मार्च पिछले साल सामने आया, जब दिल्ली में स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने के दौरान मौके पर मौजूद टीम को कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी मिली, जिसकी ऊंचाई करीब डेढ़ फीट तक बताई गई। इस घटना ने न्यायिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया था और मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया।
मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने संज्ञान लिया। इसके बाद Yashwant Varma का तबादला दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया। इसके साथ ही मामले की जांच शुरू हुई, ताकि आरोपों की सच्चाई सामने लाई जा सके।
जस्टिस वर्मा ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि घटना के समय वह घर पर मौजूद नहीं थे और न ही वह मौके पर सबसे पहले पहुंचे थे। उन्होंने संसदीय पैनल को दिए अपने बयान में कहा, "अगर अधिकारी साइट को सुरक्षित करने में नाकाम रहे तो मुझ पर इंपीचमेंट क्यों होना चाहिए... वहां मौजूद पुलिस और फायर डिपार्टमेंट के अधिकारी ज़रूरी एक्शन लेने में नाकाम रहे," उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब घटनास्थल पर मौजूद प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी थी, तो उन्हें कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
अगस्त 2025 में Om Birla ने जजेज एक्ट, 1968 के तहत तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। इस पैनल में अरविंद कुमार, मनिंदर मोहन और वरिष्ठ अधिवक्ता BV आचार्य शामिल थे। जस्टिस वर्मा ने इस पैनल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन Supreme Court of India ने उनकी याचिका खारिज कर दी और जांच जारी रखने की अनुमति दे दी।
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सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक आंतरिक जांच समिति ने पहले ही संकेत दिया था कि जिस कमरे में कथित नकदी मिली, उस पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का नियंत्रण था।
जांच लगातार जारी थी और महाभियोग की संभावना भी बढ़ रही थी। ऐसे में Yashwant Varma ने अपने पद से इस्तीफा देना ही उचित समझा।
यह मामला न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े करता है। साथ ही, यह दर्शाता है कि कानून के दायरे में हर व्यक्ति की जांच संभव है।