Trump Praises Indian Voting System: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारतीय चुनाव प्रक्रिया और वोटर आईडी कार्ड की तारीफ की। उन्होंने वोटर आईडी कार्ड को अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया में शामिल करने की वकालत करते हुए कहा कि इससे चुनाव में होने वाली धोखाधड़ी को रोका जा सकता है। ट्रंप के इस बयान को लेकर भारत में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं हैं।
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ट्रंप द्वारा चुनाव आयोग के काम की प्रशंसा को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया। वहीं, विपक्ष ने इसे लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति पर ही तंज कस दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता को अमेरिका ले जाने का अपील कर दी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में भारत में वोटर्स की पहचान करने की प्रक्रिया अमेरिकी प्रक्रिया से अच्छी है? अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में वोटर आईडी कार्ड को लेकर क्या नियम है? और भारत में वोटर आईडी कार्ड पर पहली बार फोटो कब लगाया गया था?
अमेरिका में वोटर की पहचान को लेकर नियम भारत के मुकाबले काफी अलग है। यहां वोटर की पहचान के लिए कोई एक तय नियम नहीं है बल्कि हर राज्य अपने नियम खुद तय करते हैं। इसलिए अमेरिका में वोटर की पहचान को लेकर हर राज्य के अपने अलग नियम हैं। कुछ राज्य वोटर की पहचान के लिए फोटो आईडी अनिवार्य करते हैं, तो वहीं कई राज्यों में वोटर की पहचान को लेकर अलग नियम हैं।
अमेरिका में वोटर की पहचान को लेकर मुख्य रूप से तीन नियम है। हालांकि, यह राज्यों के हिसाब से बदलते रहते है।
फोटो आईडी से पहचान: अमेरिका के कई राज्यों में वोटर की पहचान के लिए फोटो आईडी का उपयोग किया जाता है। इसके लिए ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट या स्टेट आईडी को प्रूफ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
बिना फोटो वाली आईडी: कुछ राज्यों में बिना फोटो वाली आईडी कार्ड को भी वोटर प्रूफ के रूप में स्वीकार किया जाता है। यह अधिकतर छोटे राज्य हैं। यहां यूटिलिटी बिल, बैंक स्टेटमेंट जिसमें नाम-पता हो इसे पहचान के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इससे उनकी पहचान की पुष्टि हो जाती है।
हस्ताक्षर मिलान से पहचान: अमेरिका के कई बड़े राज्यों और राजधानी वॉशिंगटन डीसी में वोटर्स से पोलिंग बूथ पर किसी भी प्रकार की आईडी नहीं मांगी जाती। उनकी पहचान हस्ताक्षर मिलान या पहले से मौजूद रिकॉर्ड्स के जरिए की जाती है।
अमेरिका के अलावा दूसरे विकसित देशों की बात करें, तो जापान, चीन और यूरोपीय देशों में इसे लेकर अलग-अलग नियम हैं।
ब्रिटेन: ब्रिटेन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में से एक है। हालांकि यहां लंबे समय तक वोटर की पहचान के लिए फोटो आईडी प्रूफ अनिवार्य नहीं थी। लेकिन बीते कुछ सालों में ब्रिटेन ने फोटो-आईडी को अनिवार्य बनाने की ओर कदम उठाए हैं।
चीन: चीन लंबे समय तक दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश रहा है। यहां वोट देने के लिए रेजिडेंट आईडी का उपयोग किया जाता है। चीन की सरकार ने इसे पूरे देश में स्टैंडर्ड नेशनल आईडी के तौर पर मान्यता दी हुई है। इसमें वोटर की बेसिक जानकारी के साथ उनका बायोमेट्रिक डाटा भी शामिल होता है। जिसमें दूसरी कई और जानकारियां होती हैं। चीन में हर चुनाव से पहले लोकल इलेक्शन कमेटी लोगों के घरों में जाती है और वोटर के डाटाबेस को अपडेट करती है।
जापान: जापान को दुनिया का सबसे आधुनिक देश माना जाता है। यहां दूसरे देशों की तरह फोटो आईटी सिस्टम नहीं है। जापान में मतदान के लिए वोटर्स को ईमेल के जरिए वोटिंग प्लेस एंट्रेंस टिकट भेजा जाता है। लोग मेल पर अपने पोलिंग सेंटर पर जाते हैं और मेल किया हुआ टिकट वहां तैनात अधिकारियों को दिखाते हैं। अधिकारी टिकट को स्कैन करके उसकी जांच करते हैं और फिर जांच पूरी होने के बाद लोग अपना वोट देते हैं। यदि कभी मेल पर पोलिंग एंट्रेंस टिकट आता है तो वोटर्स बायोमेट्रिक के जरिए अपनी पहचान के बाद वोट कर सकते हैं।
मेक्सिको: अमेरिका के पड़ोसी देश मेक्सिको में 18 साल से अधिक उम्र के नागरिकों को नेशनल इलेक्टोरल इंस्टीट्यूट (INE) की तरफ से ‘वोटर क्रेडेंशियल’ कार्ड दिया जाता है। वोटर क्रेडेंशियल कार्ड में वोटर की फोटो, फिंगरप्रिंट और बायोमेट्रिक्स का डाटा QR कोड के रूप में होता है। चुनाव में वोट देने के साथ इस कार्ड का उपयोग बैंकिंग और यात्रा जैसे कामों में पहचान पत्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
यूरोपीय देश: यूरोपीय देशों में से केवल ब्रिटेन को छोड़कर बाकी सभी में वोट डालने के लिए सरकार की ओर से जारी किए गए फोटो वोटर आईडी दिखाना आवश्यक है।
भारत का वोटर आईडी सिस्टम दुनिया से पहले पुराने लोकतांत्रिक पहचान सिस्टम में से एक है। भारत में इसकी शुरुआत साल 1951-52 में पहले आम चुनाव के साथ ही हो गई थी। भारतीय चुनाव आयोग ने जब पहले आम चुनाव के लिए हर नागरिक के लिए एक अलग वोटर आईडी बनाने का ऐलान किया था तब भारत की जनसंख्या को देखते हुए लगभग नामुमकिन मान लिया गया था। लेकिन चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कड़ी मेहनत से मुमकिन करके दिखाया था।
हालांकि, पहले आम चुनाव में लोगों को चुनाव आयोग द्वारा जो वोटर आईडी दी गई थी उसमें फोटो नहीं थी। केवल वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होता था और उसी के आधार पर वोट डाले जाते थे। भारतीय वोटर आईडी कार्ड में लोगों की पहचान के तौर पर उनकी फोटो लगाना का श्रेय भारत के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन को जाता है। वह शेषन ही थे जिन्होंने 1993 में भारी आलोचनाओं के बाद भी वोटर आईडी कार्ड में वोटर्स के फोटो लगाने को अनिवार्य किया। वर्तमान में चुनाव आयोग ने जो वोटर आईडी कार्ड जारी करता है, उसमें वोटर की फोटो, नाम, पिता/पति का नाम, उम्र और अधिकारिक पते के साथ 10-अंकों/अक्षरों का एक यूनीक EPIC नंबर भी होता है।