Highlights:
सितंबर में खुदरा महंगाई दर 5.6% रहने का अनुमान है।
खाद्य पदार्थों और कच्चे तेल की कीमतें महंगाई बढ़ा सकती हैं।
अप्रैल से सितंबर तक महंगाई लगातार बढ़ने का अनुमान है।
रेपो दर बढ़ने से होम और कार लोन की ईएमआई बढ़ सकती है।
India Retail Inflation September 2026: खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, ऊर्जा लागत में तेजी और प्रतिकूल आधार प्रभाव के चलते देश में खुदरा महंगाई का दबाव लगातार बढ़ने की आशंका है। सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.6% तक पहुंच सकती है। ऐसा होने पर यह करीब 23 महीने का सबसे ऊंचा स्तर होगा। अगस्त में खुदरा महंगाई दर 4.82% दर्ज की गई थी।
मिंट द्वारा 19 अर्थशास्त्रियों के बीच कराए गए सर्वेक्षण में सितंबर की महंगाई दर 5% से 5.9% के बीच रहने का अनुमान जताया गया है। सितंबर के आधिकारिक आंकड़े 12 अक्तूबर को जारी किए जाने हैं। ऐसे में 5.6% का आंकड़ा अभी अनुमानित है, न कि सरकार की ओर से जारी अंतिम आंकड़ा।
महंगाई बढ़ने का असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। सब्जियों, दालों, अनाज, खाद्य तेल और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों के महंगे होने से परिवारों का मासिक बजट बिगड़ सकता है। इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से परिवहन और अन्य वस्तुओं की लागत भी बढ़ने की आशंका है।
रिपोर्ट के मुताबिक, देश में खुदरा महंगाई का ग्राफ अप्रैल से लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है। अप्रैल में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित महंगाई दर 3.48% थी। मई में यह बढ़कर 3.93% और जून में 4.38% हो गई। इसके बाद जुलाई में महंगाई दर 4.45% और अगस्त में 4.82% दर्ज की गई। अगर सितंबर के लिए जताया गया अनुमान सही साबित होता है, तो खुदरा महंगाई लगातार छठे महीने बढ़ोतरी दर्ज करेगी। इससे आने वाले समय में घरेलू खर्च और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को लेकर चिंता बढ़ सकती है।
| खुदरा महंगाई दर | महीना |
|---|---|
| 3.48% | अप्रैल 2026 |
| 3.93% | मई 2026 |
| 4.38% | जून 2026 |
| 4.45% | जुलाई 2026 |
| 4.82% | अगस्त 2026 |
| 5.60% | सितंबर 2026 (अनुमानित) |
खुदरा महंगाई में तेजी की एक प्रमुख वजह खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी काफी अधिक है। ऐसे में खाद्य कीमतों में होने वाला बदलाव कुल महंगाई दर को सीधे प्रभावित करता है।
प्याज और दूसरी सब्जियों के साथ अनाज, दालों, खाद्य तेल और चीनी की कीमतों में बने दबाव से महंगाई का दायरा बढ़ रहा है। इससे संकेत मिलता है कि महंगाई की समस्या केवल कुछ चुनिंदा सब्जियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतें भी इसमें योगदान दे रही हैं।
आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में मौसम और वैश्विक बाजार की अहम भूमिका रहेगी। कमजोर मानसून, अल नीनो की आशंका और ऊर्जा सहित अन्य जिंसों की ऊंची कीमतें आपूर्ति पर दबाव बढ़ा सकती हैं।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी भारत के लिए चिंता का विषय है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने से परिवहन समेत कई क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है।
हालांकि, सितंबर में महंगाई दर बढ़ने के पीछे केवल मौजूदा कीमतों में वृद्धि ही जिम्मेदार नहीं होगी। पिछले साल सितंबर में खाद्य मूल्य सूचकांक में गिरावट दर्ज की गई थी। इस बार आधार प्रभाव में बदलाव के कारण भी सालाना खुदरा महंगाई दर ऊंची दिखाई दे सकती है।
महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अक्तूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर को 0.25 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 5.50% कर दिया। केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत दिशा में बदलाव करते हुए रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ भी कर दिया है।
इस फैसले से निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना कमजोर हो सकती है। आम लोगों के लिए इसका असर होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्जों की मासिक किस्त यानी ईएमआई पर दिखाई दे सकता है। खासकर उन कर्जदारों पर दबाव बढ़ सकता है, जिनके ऋण की ब्याज दरें रेपो दर में बदलाव के साथ संशोधित होती हैं और बैंक बढ़ी हुई दरों का बोझ ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। आगे खुदरा महंगाई किस दिशा में जाएगी, यह खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और रुपये की चाल जैसे कारकों पर निर्भर करेगा।