चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, फोटो- सोशल मीडिया 
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कटघरे में ज्ञानेश कुमार...महाभियोग पूरा होते-होते बीत जाएगा बंगाल चुनाव, जानें क्या है पूरा प्रॉसेस

Gyanesh Kumar: यदि यह पाया जाता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का मामला बनता है तो फिर इस पर दोनों सदनों या संयुक्त सदन बुलाकर इस पर चर्चा की जाएगी।

अर्पित शुक्ला

Impeachment Motion Against Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव राज्यसभा और लोकसभा सचिवालय को सौंप दिया गया है। शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस ने 10 पन्नों से अधिक की नोटिस में उन्हें पद से हटाने के सात कारण बताए हैं। इन आरोपों में बिहार की SIR प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि इससे लोगों के मतदान के अधिकार प्रभावित हुए हैं और कुछ राजनीतिक दलों के प्रति पक्षपात किया गया। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया गया है।

सभापति के पास 14 दिन का समय

अब दोनों सदनों के सभापतियों के पास इस नोटिस पर विचार करने के लिए 14 दिनों का समय है। यदि इस दौरान तृणमूल कांग्रेस अपना आवेदन वापस नहीं लेती और प्रारंभिक जांच में नोटिस सही पाया जाता है, तो लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति मिलकर एक समिति गठित करेंगे। इस समिति का काम आरोपों की जांच करना और यह तय करना होगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग का मामला बनता है या नहीं। यदि समिति को आरोप सही लगते हैं, तो संसद के दोनों सदनों में या संयुक्त सत्र में इस पर चर्चा कराई जाएगी। इस दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त को अपना पक्ष रखने और वकील नियुक्त करने का अधिकार भी होगा।

1993 में भी सामने आया था ऐसा मामला

भारतीय संसद के इतिहास में 1993 में जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग का मामला सामने आया था। उस समय लोकसभा में अलग से एक कठघरा बनाया गया था, जहां से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने जस्टिस रामास्वामी की ओर से दलीलें पेश की थीं। हालांकि बहस खत्म होने के बाद जस्टिस रामास्वामी ने इस्तीफा दे दिया था।

तीन सदस्यीय समिति करेगी जांच

नियमों के अनुसार महाभियोग की जांच के लिए तीन सदस्यों की समिति बनाई जाती है। इसमें एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ वकील या कानूनी विशेषज्ञ शामिल होता है। इसी तरह की प्रक्रिया फिलहाल जस्टिस यशवंत वर्मा के मामले में भी अपनाई जा रही है और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव आने पर भी यही प्रक्रिया लागू होगी।

कांग्रेस ने टीएमसी को दी अगुवाई

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने के मामले में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस को नेतृत्व करने दिया है। सूत्रों के मुताबिक, पहले लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर दोनों दलों के बीच सहमति बनी थी। उसी समझ के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग के मामले में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने टीएमसी का समर्थन किया। महाभियोग प्रस्ताव के लिए लोकसभा के कम से कम 100 और राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। टीएमसी के इस प्रस्ताव पर लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं।

जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला भी लंबित

संसद में एक अन्य महाभियोग प्रस्ताव जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भी लंबित है। उनके घर से जले हुए नोट मिलने के मामले में लोकसभा अध्यक्ष ने तीन सदस्यीय समिति गठित की है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील बी.वी. आचार्य शामिल हैं। यह समिति 25 फरवरी को बनाई गई थी और उम्मीद है कि इस मामले पर अपनी रिपोर्ट मानसून सत्र तक दे सकती है।

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले राजनीतिक संदेश

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम पांच महीने लग सकते हैं। तब तक पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव भी संपन्न हो चुके होंगे और नई सरकार का गठन हो सकता है।

तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि यह राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा है। पार्टी का दावा है कि मतदाता सूची से गलत तरीके से नाम हटाए गए हैं और इसी मुद्दे को लेकर वह सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट और संसद तक आवाज उठा रही है। पार्टी का उद्देश्य अपने समर्थकों को यह संदेश देना भी है कि वह उनके मतदान अधिकार की रक्षा के लिए हर स्तर पर संघर्ष कर रही है।

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