दीनदयाल उपाध्याय की जयंती (AI जेनरेटेड इमेज)
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दीनदयाल उपाध्याय की मौत हादसा या हत्या, नानाजी देशमुख ने क्यों कहा था राजनीतिक साजिश, जानिए क्या थी सच्चाई?

Deendayal Upadhyaya Death Mystery: दीनदयाल उपाध्याय की 1968 में ट्रेन यात्रा के दौरान मौत आज भी चर्चा में है। जानिए राजनीतिक साजिश के दावे, नानाजी देशमुख की भूमिका और चंद्रचूड़ आयोग की जांच।

अक्षय साहू

Deendayal Upadhyaya Birth Anniversary: 25 सितंबर को भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय की जयंती मनाई जाती है। उनकी राजनीतिक विचारधारा और संगठन में भूमिका पर अक्सर चर्चा होती है, लेकिन उनकी मौत आज भी उनके जीवन से जुड़े सबसे चर्चित विवादों में शामिल है। 10 फरवरी 1968 की रात लखनऊ से पटना जा रही ट्रेन में सवार दीनदयाल उपाध्याय अगले दिन मुगलसराय स्टेशन पर मृत मिले थे। उनकी मौत को लेकर शुरुआत से ही कई सवाल उठे। जनसंघ के एक धड़े ने इसे राजनीतिक साजिश बताया, जबकि सीबीआई की जांच में इसे चोरी की कोशिश से जुड़ी हत्या माना गया।

इस पूरे मामले में नानाजी देशमुख का नाम भी अहम है। वे उस समय जनसंघ के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और पार्टी की ओर से उपाध्याय की मौत से जुड़े तथ्य जुटाने के लिए बनाई गई समिति के अध्यक्ष थे। एजी नूरानी की रिपोर्ट के मुताबिक, नानाजी ने आयोग के सामने अपना बयान भी दर्ज कराया था और जनसंघ की ओर से पेश किए गए 51 गवाहों में वे शामिल थे।

कैसे हुई थी दीनदयाल उपाध्याय की मौत? 

दीनदयाल उपाध्याय 10 फरवरी 1968 की शाम लखनऊ से पटना जाने वाली सियालदह एक्सप्रेस में सवार हुए थे। ट्रेन रात में वाराणसी से आगे बढ़ी और करीब 2:10 बजे मुगलसराय पहुंची। लेकिन तब तक उपाध्याय ट्रेन में नहीं थे। इसके करीब 10 मिनट बाद उनका शव स्टेशन के पास ट्रैक्शन पोल के नजदीक मिला।

उनके हाथ में पांच रुपये का नोट था। ट्रेन में उनके सामान और एक फाइल से जुड़ी जानकारी भी सामने आई। एक यात्री एमपी सिंह ने दावा किया था कि उसने उपाध्याय के केबिन से एक व्यक्ति को सामान लेकर जाते देखा था। इस मामले में भरत लाल और राम अवध को आरोपी बनाया गया। दोनों हत्या के आरोप से बरी हो गए। भरत लाल को उपाध्याय का सामान चोरी करने के मामले में दोषी पाया गया।इसके बाद भी यह सवाल बना रहा कि आखिर दीनदयाल उपाध्याय की मौत कैसे हुई।

नानाजी देशमुख की भूमिका क्यों अहम थी

मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए जांच आयोग बनाया गया। बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़ को आयोग का एकमात्र सदस्य बनाया गया। इस आयोग के सामने जनसंघ ने दावा किया कि उपाध्याय की हत्या के पीछे राजनीतिक साजिश थी।

नानाजी देशमुख उस समय जनसंघ के कोषाध्यक्ष थे। पार्टी की ओर से उपाध्याय की मौत से जुड़े तथ्य जुटाने के लिए जो समिति बनाई गई, उसकी अध्यक्षता नानाजी ने की थी। उन्होंने आयोग के सामने अपना पक्ष भी रखा।

जनसंघ का दावा था कि उपाध्याय के राजनीतिक विरोधी थे और उनकी हत्या के पीछे कम्युनिस्टों तथा कुछ मुस्लिम संगठनों से जुड़े लोगों की भूमिका हो सकती है। पार्टी ने मेजर सुरेंद्र मोहन शर्मा और डॉ. ए.जे. फरीदी के बीच संबंधों को भी इस कथित साजिश से जोड़ने की कोशिश की।

लोगों को संबोधित करते दीनदयाल उपाध्याय

राजनीतिक हत्या का शक क्यों हुआ?

जनसंघ की तरफ से आयोग के सामने जो कहानी रखी गई, उसके मुताबिक उपाध्याय की हत्या ट्रेन के अंदर की गई थी। दावा था कि पहले उनके सिर पर हमला किया गया, फिर उनके शव को ट्रेन से बाहर रखकर ऐसी स्थिति बनाई गई जिससे यह दुर्घटना या चोरी की घटना लगे।

जनसंघ ने यह भी दावा किया कि उपाध्याय को पहले से कुछ संदिग्ध लोग फॉलो कर रहे थे और उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें निशाना बनाया जा सकता था।

नानाजी देशमुख की अध्यक्षता वाली समिति ने भी इस मामले में जानकारी जुटाई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, नानाजी और बिहार जनसंघ के संगठनात्मक सचिव अश्विनी कुमार ने अपने बयान में कहा था कि उपाध्याय राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाते थे। हालांकि, आयोग के सामने पेश की गई नानाजी की समिति की रिपोर्ट में उस फाइल या डायरी का कोई उल्लेख नहीं मिला, जिसका जिक्र बाद में किया गया।

जांच में क्या सामने आया

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की जांच में जनसंघ के राजनीतिक साजिश वाले दावे को समर्थन देने वाला पर्याप्त सबूत नहीं मिला। आयोग के मुताबिक उपाध्याय को चलती ट्रेन से बाहर गिराया गया था। उनके शरीर पर लगी चोटें एक ही घटना में लगी थीं और ऐसी चोटें थीं, जिन्हें डिब्बे के अंदर हुई घटना से जोड़ना मुश्किल था। आयोग ने यह भी माना कि हत्या के साथ ही चोरी हुई थी। यानी हत्या और सामान चोरी की घटना को एक ही घटना का हिस्सा माना गया।

डिब्बे के अंदर हत्या होने के दावे पर भी आयोग ने सवाल उठाए। रिपोर्ट के मुताबिक अगर ट्रेन के डिब्बे के अंदर संघर्ष हुआ होता तो वहां खून के निशान या संघर्ष के दूसरे सबूत मिलने चाहिए थे। लेकिन ऐसे निशान नहीं मिले। उपाध्याय के कपड़ों पर भी संघर्ष के निशान नहीं थे।

फरीदी को जोड़ने का दावा भी खारिज

जनसंघ ने डॉ. ए.जे. फरीदी को भी कथित साजिश से जोड़ने की कोशिश की थी। इसके लिए तीन गवाह पेश किए गए। लेकिन आयोग के सामने उनके बयानों में कई कमियां सामने आईं।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि फरीदी को उपाध्याय की हत्या से जोड़ने का आरोप बेबुनियाद था। उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि नानाजी देशमुख की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट में भी फरीदी का कोई उल्लेख नहीं था।

गुरु गोलवलकर और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ दीनदयाल उपाध्याय

नानाजी की डायरी वाला मामला

जांच के दौरान एक डायरी भी सामने आई। रामचार्य पांडे नाम के पार्टी कार्यकर्ता ने दावा किया कि उपाध्याय की मौत की जानकारी मिलने के बाद उन्हें मुगलसराय जाकर जानकारी जुटाने के लिए कहा गया था और उन्होंने इसकी जानकारी अपनी डायरी में लिखी।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस डायरी को विश्वसनीय नहीं माना। रिपोर्ट में कहा गया कि डायरी में कुछ ऐसी जानकारी पहले से दर्ज थी, जो बाद की तारीख में नानाजी देशमुख द्वारा दी गई थी। आयोग ने इसे मनगढ़ंत दस्तावेज माना।

नानाजी के बयान पर भी सवाल उठे। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि वह नानाजी के इस बयान को स्वीकार नहीं कर सकते कि उन्होंने 11 फरवरी की सुबह रामचार्य को फोन करके जानकारी जुटाने के लिए कहा था। रिपोर्ट में लखनऊ से बंबई की उस कथित फोन कॉल के रिकॉर्ड पर भी सवाल उठाया गया।

नानाजी देशमुख

नानाजी खुद किस बात से असहमत थे

दीनदयाल उपाध्याय की मौत को लेकर बाद के वर्षों में भी अलग-अलग थ्योरी सामने आती रहीं। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक नानाजी देशमुख ने उस थ्योरी पर भी सवाल उठाया था जिसमें कहा गया था कि उपाध्याय आधी रात को ट्रेन के दरवाजे पर खड़े थे और उन्हें चलती ट्रेन से धक्का दिया गया।

रिपोर्ट में नानाजी के हवाले से सवाल दर्ज है कि आखिर इतनी रात को उपाध्याय ट्रेन के दरवाजे पर क्यों खड़े होंगे। यानी नानाजी की भूमिका को केवल राजनीतिक हत्या के दावे तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टों में उनके अलग-अलग सवाल और संदेह दर्ज हैं।

सबूतों की कमी के चलते आयोग का इनकार

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उनके सामने ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं आया जिससे यह साबित हो कि दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के पीछे राजनीतिक साजिश थी। उन्होंने सीबीआई की जांच में कुछ कमियों और चूकों का भी उल्लेख किया, लेकिन राजनीतिक साजिश छिपाने के आरोप को सही नहीं माना।

इस तरह दीनदयाल उपाध्याय की मौत का मामला दो अलग-अलग दावों के बीच रहा। जनसंघ की तरफ से राजनीतिक साजिश की थ्योरी रखी गई और नानाजी देशमुख उस जांच और तथ्य जुटाने की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका में थे। वहीं न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के आयोग ने उपलब्ध सबूतों के आधार पर राजनीतिक हत्या के दावे को स्वीकार नहीं किया।

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