नवभारत विशेष: BRICS घोषणापत्र पर बनी सहमति, 45 पन्नों में आतंकवाद से टैरिफ तक का जिक्र

BRICS New Delhi Declaration: दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में 45 पन्नों और 140 बिंदुओं वाले घोषणापत्र पर सहमति भारत की कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है। इसमें आतंकवाद और मध्य-पूर्व का जिक्र है।
BRICS 140 Point Declaration
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में PM मोदीफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
Published on
Updated on

BRICS 140 Point Declaration: दिल्ली में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले सबसे बड़ा सवाल यही था कि नेता किसी साझा घोषणापत्र पर सहमत हो पाएंगे? इसी साल मई में दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक बिना संयुक्त घोषणापत्र के समाप्त हुई थी।

पश्चिम एशिया के संकट, विशेषकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तीखे मतभेदों ने यह संकेत दे दिया था कि विस्तारित ब्रिक्स में सहमति-निर्माण कहीं अधिक कठिन हो चुकी है। ऐसे वातावरण में 12 सितंबर को दिल्ली में डिक्लेरेशन पर सर्वसम्मति बन जाना भारत की मेजबानी और उसकी सक्रिय, संतुलित एवं व्यावहारिक कूटनीति की महत्वपूर्ण सफलता है।

45 पन्नों और 140 बिंदुओं वाले इस घोषणापत्र में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के साथ-साथ टेरर फंड, फिलिस्तीन, गाजा, टैरिफ और लेबनान का जिक्र किया गया है। साथ ही मध्य-पूर्व के शांतिपूर्ण हल की अपील की गई है। ब्रिक्स घोषणा पत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिकी टैरिफ का नाम तो नहीं लिया गया है, लेकिन साफ तौर पर कहा गया है कि कई देशों को 'अन्यायपूर्ण और एकतरफा संरक्षणवादी कदमों' से नुकसान हो रहा है।

BRICS में भारत की कूटनीति

यह इशारा डोनाल्ड ट्रंप की ओर से भारत, चीन समेत दुनिया के कई देशों पर लगाए गए टैरिफ की ओर ही था। ब्रिक्स अब पहले वाला छोटा समूह नहीं है। इसका विस्तार हुआ है और इसमें अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, सुरक्षा चिंताओं, आर्थिक हितों और विदेश नीति के दृष्टिकोण वाले देश शामिल हैं। अकेले घोषणापत्र जारी कर देना असाधारण उपलब्धि नहीं होती। यह असाधारण तब बनती है, जब ऐसा दस्तावेज ऐसे समूह में तैयार हो, जिसके सदस्य एक-दूसरे के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी हों।

भारत ने इस चुनौती को मुद्दा आधारित सहमति और आम सहमति आधारित कूटनीति के माध्यम से संभाला। भारत एक साथ अनेक शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की स्वतंत्रता सुरक्षित रखता है। दिल्ली शिखर सम्मेलन में चीन, रूस, ईरान, यूएई और अन्य देशों की उपस्थिति के बीच संवाद का वातावरण बनना इसी का प्रमाण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकासशील देशों को केवल वैश्विक व्यवस्था के 'नियम मानने वाले' नहीं बल्कि 'नियम बनाने वाले' बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

BRICS में पश्चिम एशिया से स्थानीय मुद्रा तक सहमति

यह महज भाषण का राजनीतिक मुहावरा नहीं है, यह वैश्विक शासन में प्रतिनिधित्व के मौजूदा असंतुलन को चुनौती देने वाली कूटनीतिक अवधारणा है। भारत ने ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच बनाने के बजाय वैश्विक दक्षिण की रणनीतिक एजेंसी के मंच के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। यही अंतर भारत की अध्यक्षता को चीन या रूस की संभावित दृष्टि से अलग करता है।

दिल्ली की कूटनीतिक परीक्षा सबसे अधिक पश्चिम एशिया के मुद्दे पर हुई। ईरान और यूएई दोनों की मौजूदगी में ऐसा शब्द-संतुलन तैयार करना आसान नहीं था, जिसे सभी स्वीकार कर सकें। घोषणापत्र में हिंसा पर चिंता, अधिकतम संयम और संवाद तथा कूटनीति के माध्यम से विवादों के समाधान पर जोर दिया गया।

घोषणा ने ब्रिक्स की आर्थिक भूमिका को भी अधिक व्यावहारिक दिशा देने की कोशिश की है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश, सीमा-पार भुगतान व्यवस्था, न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण और प्रस्तावित निवेश मंच जैसे मुद्दे इसमें शामिल हैं। हालांकि साझा ब्रिक्स मुद्रा का कोई तात्कालिक निर्णय नहीं हुआ, लेकिन स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन और भुगतान प्रणालियों के बीच सहयोग की दिशा में आगे बढ़ना अधिक व्यावहारिक कदम है।

BRICS 140 Point Declaration
दिल्ली में सप्ताहांत कर्फ्यू आरंभ, अगले 55 घंटे तक गैर-आवश्यक गतिविधियों पर रहेगी रोक

भारत की बड़ी उपलब्धि

ब्रिक्स में चीन और भारत की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस और पश्चिम के बीच गहरी खाई है। ईरान और उसके विरोधी देशों के अपने क्षेत्रीय समीकरण हैं। आर्थिक हित भी हमेशा समान नहीं है। इसलिए सर्वसम्मति बनाए रखना भविष्य में और कठिन होगा। भारत की अगली चुनौती होगी कि दिल्ली की सहमति को बहुपक्षवाद में बदला जाए।

लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com