भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत (सोर्स- सोशल मीडिया)
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मजबूत लोकतंत्र के लिए आलोचना जरूरी, अदालती फैसलों पर CJI सूर्यकांत का बड़ा बयान, कहा- जनता का भरोसा जीते

CJI Surya Kant: CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका खुद को जांच से बाहर रखकर जनता का भरोसा नहीं जीत सकती। मजबूत लोकतंत्र के लिए अदालती कामकाज की निष्पक्ष आलोचना बेहद जरूरी है।

अक्षय साहू

CJI Surya Kant on Judiciary Accountability: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सोमवार को जोर देकर कहा कि न्यायपालिका कभी भी खुद को जांच के दायरे से बाहर रखकर जनता का भरोसा नहीं जीत सकती। न्यायतंत्र को जांच, सवाल और आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने यह बयान दिवंगत पूर्व वरिष्ठ अधिवक्ता रामजेठ मालानी के जन्मदिन के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में दिया। 

नई दिल्ली में जस्टिस सीन टू बी डन: ट्रांसपेरेंसी एंड पब्लिक ट्रस्ट एज पिलर्स ऑफ द लीगल सिस्टम पर छठा राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर देते हुए, जस्टिस कांत ने इस बात पर जोर दिया कि संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार के लिए अदालती कामकाज की निष्पक्ष, जानकारी वाली और रचनात्मक आलोचना जरूरी है।

अदालतों को आलोचना के लिए तैयार रहना जरूरी

सीजेआई सूर्यकांत ने NCERT की एक पाठयपुस्तक के बारे में सुप्रीम कोर्ट की हालिया सू मोटो कार्यवाही का जिक्र करते हुए कहा कि एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका की आलोचना के खिलाफ नहीं है, और न ही हो सकती है। उन्होंने कहा कि न्यायिक कार्य की निष्पक्ष, जानकारी वाली और रचनात्मक आलोचना एक मजबूत संवैधानिक लोकतांत्र की वैध और जरूरी खासियत है। 

सीजेआई ने आगे कहा कि यह पारदर्शिता का हृदय है, क्योंकि कोई भी अदालत खुद को जांच से परे रखकर जनता का भरोसा नहीं जीत सकता है उसे जांच, सवाल और जहां जरूरी हो, आलोचना के लिए तैयार रहना चाहिए। 

अदालती फैसलों के तर्क की जांच जरूरी 

उन्होंने आगे कहा कि, न्यायिक कामकाज में पारदर्शिता केवल खुली अदालतों और पब्लिक हियरिंग के बारे में नहीं है। इसके लिए न्यायिक फैसलों के पीछे के तर्क की भी जांच होनी चाहिए, जिसमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके खिलाफ फैसला दिया गया है।

उन्होंने कहा, इसका मतलब है कि किसी फैसले के नतीजे के साथ-साथ उसके आधार और तर्क को भी कोई भी व्यक्ति जांच सके, खासकर वे लोग जो उस फैसले से प्रभावित हुए हैं या जिनके खिलाफ फैसला दिया गया है। उन्होंने कहा जो कोर्ट अपने फैसले सुनाते हैं, लेकिन अपनी बात अपने तक ही रखते हैं, वह असल में पारदर्शिता नहीं है, चाहे उन्होंने और कुछ भी किया हो।

जनता के भरोसे और मंजूरी में अंतर 

सीजेआई सूर्यकांत ने आगे जनता के भरोसे और जनता की मंजूरी के बीच के अंतर को समझाते हुए कहा कि कोर्ट सिर्फ पसंद किए जाने या लोगों की पसंद के नतीजे देने से भरोसा नहीं जीतते हैं। भरोसा तब मिलता है जब केस हारने वाले लोग अब भी मानते हैं कि जिस प्रक्रिया ने उनके खिलाफ फैसला दिया वह निष्पक्ष था।

उन्होंने कहा, भरोसा तब मिलता है जब हारने वाले लोग, जो बिल्कुल अलग नतीजा चाहते थे, फिर भी यह मानते हुए चले जाते हैं कि जिस प्रक्रिया ने उनके खिलाफ फैसला दिया वह निष्पक्ष था। यह कहीं ज्यादा मुश्किल काम है, और कहीं अधिक कीमती है।

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