निशिकांत दुबे, फोटो - सोशल मीडिया  
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निशिकांत दुबे का एक और नया विवादित बयान, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर कही ऐसी बात कि अब होगा भयानक बवाल

वक्फ कानून को लेकर शुरू हुई बहस अब चुनाव आयोग, न्यायपालिका और धार्मिक पहचान के सवाल तक पहुंच चुकी है। निशिकांत दुबे ने एक और नया विवादित बयान दे दिया है, जिससे देश की सियासत में भयानक भूचाल आने वाला है।

विकास कुमार उपाध्याय

नई दिल्ली : देश में वक्फ कानून को लेकर छिड़ी बहस अब तेज होती जा रही है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी द्वारा वक्फ कानून पर की गई टिप्पणी के बाद, बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने उन पर सीधा हमला बोलते हुए एक और नया विवादित बयान दे डाला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर कुरैशी पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे "चुनाव आयुक्त नहीं, मुस्लिम आयुक्त" की भूमिका निभा रहे थे।

निशिकांत दुबे ने अपने पोस्ट में लिखा, "झारखंड के संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठियों को वोटर सबसे ज्यादा आपके कार्यकाल में ही बनाया गया। इतना ही नहीं, उन्होंने भारत के प्राचीन इतिहास और धार्मिक विरासत का जिक्र करते हुए कहा कि पैगंबर मोहम्मद साहब का इस्लाम भारत में 712 ईस्वी में आया, उससे पहले यह भूमि हिंदुओं, आदिवासियों, जैन और बौद्धों की थी। दुबे ने दावा किया कि उनके गांव विक्रमशिला विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने 1189 में जलाया था, जो एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक केंद्र था और जिसने दुनिया को पहला कुलपति अतिश दीपांकर दिया था।

निशिकांत दुबे का एक्स पोस्ट

राजनीतिक तनाव और धार्मिक संवेदनाएं

इस बयानबाजी के केंद्र में हालिया वक्फ (संशोधन) कानून है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कुछ प्रावधानों के अमल पर रोक लगा दी है। SY कुरैशी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि यह संशोधन "सरकार की खुली और दुर्भावनापूर्ण योजना है, जिसका मक़सद मुस्लिम समुदाय की ज़मीनों पर कब्जा करना है।"

उनकी इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई, और निशिकांत दुबे के तीखे और धार्मिक रंग लिए बयान ने इस बहस को और तीव्र कर दिया है। खास बात यह है कि ये टिप्पणी ऐसे समय आई है जब दुबे सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना पर भी विवादित बयान देकर आलोचना का सामना कर रहे हैं।

भाजपा का रुख और संभावित असर

हालांकि भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने दुबे के पिछले बयानों को व्यक्तिगत राय बताकर पल्ला झाड़ लिया था, लेकिन पार्टी की ओर से इस ताजा बयान पर अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है। इस तरह के बयानों से देश में धार्मिक ध्रुवीकरण और संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की टिप्पणी न सिर्फ लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती है, बल्कि समाज में विभाजन की लकीर को और गहरा करती है।

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