एक्ट्रेस वैजयंती माला (सौ. डिजाइन फोटो)
हिंदी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार और मशहूर भरतनाट्यम नृत्यांगना वैजयंतीमाला की गिनती बॉलीवुड की सबसे स्वाभिमानी अभिनेत्रियों में होती है। 13 अगस्त 1933 को चेन्नई में जन्मीं वैजयंतीमाला ने अपनी अदाकारी और डांस से लगभग दो दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। लेकिन उनके जीवन का सबसे चर्चित किस्सा साल 1955 में आई फिल्म 'देवदास' से जुड़ा है।फिल्म 'देवदास' में उन्होंने 'चंद्रमुखी' का यादगार किरदार निभाया था, जिसके लिए उन्हें 'बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस' (सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री) के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए चुना गया। लेकिन वैजयंतीमाला ने यह अवॉर्ड लेने से साफ इनकार कर दिया। उनका मानना था कि फिल्म में चंद्रमुखी का रोल बेहद मजबूत और केंद्रीय था, जो मुख्य नायिका (सुचित्रा सेन) के बराबर था। उन्होंने अपने आत्म-सम्मान से समझौता न करते हुए अवॉर्ड ठुकरा दिया।
वैजयंतीमाला ने महज 14 साल की उम्र में तमिल फिल्म 'वज़काय' से अपने करियर की शुरुआत की थी, जो बॉक्स ऑफिस पर बेहद सफल रही। इसके बाद 1951 में इसका हिंदी रीमेक 'बहार' नाम से बना। फिल्म 'नागिन' के गाने 'तन डोले मेरा मन डोले' पर उनके डांस ने हर किसी को दीवाना बना दिया था। हालांकि साल 1955 में उनकी लगातार 5 फिल्में फ्लॉप हो गईं और लगा कि उनका करियर खत्म हो गया। लेकिन विमल रॉय की फिल्म 'देवदास' ने उनकी किस्मत बदल दी। पहले नूतन, मीना कुमारी और सुरैया जैसी बड़ी अभिनेत्रियों ने चंद्रमुखी का रोल करने से मना कर दिया था, लेकिन कम उम्र होने के बावजूद वैजयंतीमाला को यह रोल मिला और वह बॉलीवुड की पहली 'चंद्रमुखी' बन गईं।
फिल्म 'देवदास' के बाद 1957 में आई फिल्म 'नया दौर' ने वैजयंतीमाला के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। पहले इसमें मधुबाला को लिया गया था, लेकिन सेहत की वजह से उन्हें यह फिल्म छोड़नी पड़ी। 'नया दौर' उस साल की दूसरी सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी और इसने ₹5.40 करोड़ कमाए। दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला की जोड़ी पर्दे पर सुपर-हिट साबित हुई। वैजयंतीमाला अपने रुतबे और आत्म-सम्मान को लेकर काफी सजग थीं। एक बार जब शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार के लेट शेड्यूल की वजह से डायरेक्टर ने उनसे अपना टाइम बदलने को कहा, तो उन्होंने दोटुक अंदाज में कहा था—"अगर वो दिलीप कुमार हैं, तो मैं भी वैजयंतीमाला हूं!"
फिल्मी दुनिया को अलविदा कहने के बाद वैजयंतीमाला ने 1984 में कांग्रेस के टिकट पर साउथ चेन्नई लोकसभा सीट से राजनीति में कदम रखा। विपक्षी नेता एरा सेझियान ने प्रचार के दौरान तंज कसते हुए कहा था कि "मुझे लोकसभा भेजो और उन्हें आर.आर. सभा (कला केंद्र) भेजो"। लेकिन जनता ने वैजयंतीमाला को चुनकर करीब 48,000 वोटों से जीत दिलाई। इसके बाद 1989 में उन्होंने DMK के अलादी अरुणा को भी 12,000 से ज्यादा वोटों से हराया। 1993 में वे राज्यसभा सांसद बनीं। हालांकि, पार्टी की नीतियों से आहत होकर उन्होंने 1999 में कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर अपनी पीड़ा व्यक्त की। सितंबर 1999 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं।
वैजयंतीमाला का व्यक्तिगत जीवन भी काफी चर्चा में रहा। वर्ष 1968 में उन्होंने डॉक्टर चमनलाल बाली से शादी कर ली, जिसके बाद उनका नाम वैजयंतीमाला बाली हो गया। कला और सिनेमा में उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1969 में 'पद्मश्री' से सम्मानित किया था। इसके कई दशकों बाद, 90 वर्ष की उम्र में उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' (2024 में) प्रदान किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा।