पंडित जसराज (फोटो क्रेडिट- सोशल मीडिया)  
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Pandit Jasraj Career: जब ख्याल में घुला ठुमरी का भाव, पंडित जसराज ने बदली शास्त्रीय गायकी की पहचान

Pandit Jasraj Classical Music: मेवाती घराने के महान गायक पंडित जसराज ने ख्याल गायकी में ठुमरी का भाव जोड़कर शास्त्रीय संगीत को नई पहचान दी। उन्होंने जसरंगी शैली से आम श्रोताओं तक संगीत पहुंचाया।

सोनाली झा

Pandit Jasraj Birth Anniversary: भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया के दिग्गज और मेवाती घराने के अग्रणी गायक पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को हरियाणा के हिसार में हुआ था। पंडित जसराज ने आठ दशकों से भी अधिक समय तक भारतीय संगीत की सेवा की। उनका सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत को जटिलता से निकालकर आम श्रोताओं के दिलों तक पहुंचाया। ख्याल गायकी में उन्होंने ठुमरी का भाव जोड़ा, जिससे उनकी गायकी में मधुरता और इमोशनल गहराई आई। उनकी बंदिशें ‘जसरंगी’ अंदाज में गाई जाती थीं, जो उनकी विशिष्ट पहचान बन गईं।

पंडित जसराज नए दौर के संगीत से भी जुड़े रहे। शास्त्रीय संगीत के पुरोधा होने के बावजूद वे आधुनिक संगीत को खुले मन से सुनते और सराहते थे। मशहूर गजल गायक जगजीत सिंह की गजल ‘सरकती जाए रुख से नकाब’ उनकी बेहद पसंदीदा थी। कहा जाता है कि एक दिन में उन्होंने इस गजल को सौ बार तक सुना था। वे मानते थे कि सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती और खुद अपने शिष्यों से भी सीखने को हमेशा तैयार रहते थे।

पंडित जसराज को मिला था ये बड़ा सम्मान

उनके जीवन का एक ऐतिहासिक सम्मान तब सामने आया, जब इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन (IAU) ने सौरमंडल के एक माइनर प्लेनेट का नाम ‘पंडित जसराज’ रखा। यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय कलाकार बने। इससे पहले यह गौरव केवल मोजार्ट, बीथोवन और लूसियानो पावारोत्ती जैसे दिग्गजों को ही मिला था। इस सम्मान को उन्होंने ईश्वर और भारतीय संगीत के प्रति आशीर्वाद बताया था।

पंडित जसराज का करियर

पंडित जसराज ने शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ अर्ध-शास्त्रीय विधाओं को भी लोकप्रिय बनाया। हवेली संगीत, भजन और कृष्ण भक्ति से जुड़े उनके गीत आज भी श्रद्धा और भक्ति से सुने जाते हैं। ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ जैसे भजन उनकी आवाज में अमर हो गए। इसके अलावा उन्होंने ‘अबीरी तोड़ी’ और ‘पटदीपकी’ जैसे नए रागों की रचना कर संगीत को नई दिशा दी।

पंडित जसराज को पद्मश्री-पद्मविभूषण से नवाजा गया

सम्मानों की बात करें तो उन्हें 1975 में पद्मश्री और 2000 में पद्मविभूषण से नवाजा गया। वे हमेशा कहते थे कि जब वे गाते हैं तो ईश्वर को अपने सामने खड़ा महसूस करते हैं। पंडित जसराज का जाना भारतीय संगीत के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है, लेकिन उनकी साधना, सुर और विरासत सदियों तक जीवित रहेगी।

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