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फिल्मों में काम करने के फैसले से निरूपा रॉय के पिता इतने नाराज हुए कि उन्होंने 2 दशक तक बेटी का चेहरा नहीं देखा।
पति कमल रॉय के साथ ऑडिशन देने पहुंचीं निरूपा रॉय को डायरेक्टर ने एक्ट्रेस के रूप में चुन लिया था।
फिल्म ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन की मां बनकर निरूपा रॉय ने बॉलीवुड में अपनी यादगार पहचान बनाई।
Nirupa Roy Death Anniversary: भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में जब भी मां के त्याग और संघर्ष की बात होती है, तो सबसे पहले निरूपा रॉय का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है। सिल्वर स्क्रीन पर उन्होंने अपनी लाजवाब एक्टिंग से हर दर्शक के दिल को गहराई से छुआ था। दीवार और अमर अकबर एंथनी जैसी फिल्मों में उनके रोल ने इतिहास रच दिया था।
लेकिन बड़े पर्दे पर सबकी झोली खुशियों या आंसुओं से भरने वाली इस महान एक्ट्रेस की पर्सनल लाइफ काफी संघर्षों और दूरियों से भरी रही थी। फिल्मों की दुनिया में कदम रखना उनके लिए एक ऐसा इत्तेफाक साबित हुआ, जिसने उनके परिवार के रिश्तों में हमेशा के लिए दूरियां पैदा कर दी थी।
गुजरात के वलसाड में जन्मीं निरूपा रॉय के घर का माहौल कला और सिनेमा से कोसों दूर था। उनके पिता का मानना था कि फिल्में समाज और युवाओं पर बुरी तरह प्रभाव डालती हैं। इसलिए उनके घर में फिल्मों का नाम लेना भी किसी गुनाह से कम नहीं माना जाता था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और साल 1946 में उनकी लाइफ में एक अप्रत्याशित बदलाव आया।
जब डायरेक्टर विष्णु कुमार व्यास अपनी एक गुजराती फिल्म के लिए नए कलाकारों की तलाश कर रहे थे, तब उनके पति कमल रॉय ने उस ऑडिशन में हिस्सा लेने का फैसला किया। अपने पति का साथ देने के लिए वह भी उनके साथ पहुंच गईं। वहां मेकर्स की नजर पति पर नहीं पड़ी, बल्कि उन्होंने इस युवा चेहरे को अपनी फिल्म की मुख्य एक्ट्रेस के रूप में चुन लिया।
जब निरूपा रॉय की तस्वीरें अखबारों और पत्रिकाओं में छपने लगीं, तो उनके सख्तमिजाज पिता तक यह खबर पहुंच गई। उस दौर के सामाजिक दबाव और गुस्से के कारण उनके माता-पिता को समाज के ताने सुनने पड़े और रिश्तेदारों ने उनसे दूरी बना ली।
इस बात से गुस्सा होकर उनके पिता ने एक बेहद सख्त और मुस्किल फैसला ले लिया। उन्होंने अपनी बेटी से सारे रिश्ते तोड़ते हुए यह कसम खा ली कि वह जिंदगी में कभी अपनी बेटी का चेहरा नहीं देखेंगे। वह अपने इस फैसले पर ताउम्र अडिग रहे और उनकी यह जिद कभी कम नहीं हुई।
परिवार के विरोध और पिता की नाराजगी के बाद भी उन्होंने अपनी एक्टिंग जर्नी को नहीं रोका और धीरे-धीरे फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाई। शुरुआती दौर में पौराणिक फिल्मों में देवी का रोल निभाकर उन्होंने लोगों का अपार प्यार हासिल किया, जहां दर्शक सचमुच उनकी पूजा तक करने लगे थे।
इसके बाद के दशकों में उन्होंने मां के ऐसे रोल निभाए जो आज भी सिने प्रेमियों की जुबान पर हैं। उन्हें अपने बेहतरीन अभिनय के लिए कई फेमस अवॉर्डस से भी सम्मानित किया गया। हालांकि एक तरफ जहां उनका फिल्मी करियर बुलंदियों को छू रहा था, वहीं दूसरी तरफ उनके और उनके पिता के बीच की यह कड़वी दूरी पूरे 20 सालों तक ऐसी ही बनी रही और बिना मिले ही उनके पिता का निधन हो गया।
धार्मिक और पौराणिक रोल से आगे बढ़ते हुए उन्होंने समय के साथ अलग रोल को अपनाया और अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया। साल 1975 में आई यश चोपड़ा की फिल्म दीवार ने उनके फिल्मी सफर को एक अभूतपूर्व ऊंचाई मिली, जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की मां का यादगार रोल निभाया।
इस फिल्म का फेमस डायलॉग आज भी हर सिने प्रेमी की जुबान पर जिंदा है। इसके बाद उन्होंने खून पसीना, मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथनी, सुहाग और मर्द जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में अमिताभ बच्चन की मां की रोल निभाकर इस छवि को पूरी तरह अमर कर दिया।