Chhath Puja First Film Bhaiyya: भारतीय सिनेमा में देश की अलग-अलग संस्कृतियों, परंपराओं और त्योहारों को पर्दे पर दिखाने की लंबी परंपरा रही है। क्षेत्रीय लोक आस्था को बड़े पर्दे तक पहुंचाने वाली फिल्मों में साल 1961 में आई ‘भैया’ का खास स्थान माना जाता है। इस फिल्म को भारतीय सिनेमा की पहली ऐसी फिल्मों में गिना जाता है, जिसमें छठ पूजा और उससे जुड़े गीत को पर्दे पर पेश किया गया था।
साल 1961 में रिलीज हुई ‘भैया’ मुख्य रूप से मगही भाषा में बनी थी। उस दौर में क्षेत्रीय भाषाओं और ग्रामीण जीवन से जुड़ी कहानियों का मुख्यधारा के सिनेमा में प्रतिनिधित्व काफी सीमित था। शिवराज के निर्देशन में बनी इस फिल्म में तरुण बोस, पद्मा खन्ना, हेलेन, शुभा खोटे, अचला सचदेव और रामायण तिवारी जैसे कलाकार नजर आए थे।
फिल्म की कहानी एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने परिवार की खुशियों और भलाई के लिए निजी सुखों का त्याग करता है। पारिवारिक भावनाओं से जुड़ी इस कहानी में ग्रामीण जीवन और धार्मिक आस्था की झलक भी देखने को मिली।
'भैया' की सबसे खास बात इसका छठ पूजा गीत ‘सूपवे नरियरवे बाजली मूरि मैया’ था। इस गीत में छठ की आस्था और सूर्य देव की पूजा की भावना को बेहद खूबसूरती से पेश किया गया था। इस गीत को लता मंगेशकर, आशा भोसले, उषा मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मन्ना डे और कमल बारोट जैसे दिग्गज गायकों ने अपनी आवाज दी थी। संगीतकार चित्रगुप्त ने इसकी धुन तैयार की थी, जबकि गीत के बोल विद्यावासिनी देवी और प्रेम धवन ने लिखे थे।
'भैया' ने छठ पूजा और ग्रामीण संस्कृति को सिनेमा के जरिए व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने का काम किया। फिल्म ने यह भी दिखाया कि स्थानीय परंपराओं और लोक आस्था पर आधारित कहानियां बड़े पर्दे पर अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।
छठ पूजा के दौरान आज भी लता मंगेशकर के इस गीत को बिहार और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में सुना जाता है। छह दशक से ज्यादा समय बाद भी 'भैया' और इसका छठ गीत भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय संस्कृति और आस्था के प्रतिनिधित्व की एक यादगार मिसाल के तौर पर याद किए जाते हैं।