दिलीप घोष, फोटो- सोशल मीडिया 
विधानसभा चुनाव 2026

बंगाल चुनाव: संघ के प्रचारक से संसद तक का सफर, क्या खड़गपुर में फिर चल पाएगा दिलीप घोष का जादू?

Dilip Ghosh Profile: पश्चिम बंगाल भाजपा के कद्दावर नेता दिलीप घोष एक बार फिर खड़गपुर सदर से चुनावी मैदान में हैं। संघ से शुरू हुआ उनका सफर आज राज्य की राजनीति का एक बेहद अहम हिस्सा बन चुका है।

प्रतीक पाण्डेय

West Bengal Assembly Election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में जब भी किसी कद्दावर और बेबाक नेता का जिक्र होता है, तो दिलीप घोष का नाम सबसे ऊपर आता है। अपनी जमीनी पकड़ और तीखे तेवरों के लिए मशहूर दिलीप घोष एक बार फिर अपने पुराने चुनावी क्षेत्र खड़गपुर सदर की गलियों में जनता के बीच पहुंच चुके हैं।

अप्रैल 2026 के इस चुनावी समर में भाजपा ने उन पर बड़ा दांव खेला है, जिससे राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। झाड़ग्राम के एक छोटे से गांव कुलियाना से शुरू हुआ उनका यह सफर आज उन्हें बंगाल की राजनीति के उस मुकाम पर ले आया है, जहां उनकी अनदेखी करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है।

संघ की शाखा से निकलकर बंगाल की राजनीति तक का सफर

दिलीप घोष का सार्वजनिक जीवन राजनीति से नहीं बल्कि समाज सेवा और अनुशासन की पाठशाला से शुरू हुआ था। साल 1984 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक के रूप में अपनी यात्रा शुरू की थी। एक पूर्णकालिक प्रचारक के तौर पर उन्होंने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में साल 1999 से 2007 तक अहम जिम्मेदारी निभाई और संघ के पूर्व प्रमुख के.एस. सुदर्शन के सहायक के रूप में भी काम किया। साल 2014 में उन्हें संघ से भाजपा में भेजा गया और उनकी सांगठनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें बंगाल इकाई का महासचिव बनाया गया। महज एक साल के भीतर ही साल 2015 में उन्हें पश्चिम बंगाल भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया, जिसके बाद राज्य में भाजपा का एक नया और आक्रामक दौर शुरू हुआ।

खड़गपुर की करिश्माई जीत, सात बार के विधायक को हराया

साल 2016 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने खड़गपुर सदर सीट से चुनावी पदार्पण किया और सीधे कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्ञान सिंह सोहनपाल को चुनौती दी। सोहनपाल उस सीट से साल 1982 से लगातार सात बार विधायक रहे थे, लेकिन एक नवागंतुक होने के बावजूद दिलीप घोष ने उन्हें हराकर इतिहास रच दिया। उनकी इस जीत ने बंगाल में भाजपा को एक नई पहचान दी और पार्टी के विस्तार की नींव रखी। इसके बाद साल 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने मेदिनीपुर निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की और संसद तक का सफर तय किया। उनके नेतृत्व में ही भाजपा ने बंगाल की 42 में से 18 लोकसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी।

विवादों से रहा है गहरा नाता

राजनीतिक सफलताओं के साथ-साथ दिलीप घोष का नाता विवादों से भी काफी गहरा रहा है। वे अपने उन बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहे हैं जो कई बार बड़ी हेडलाइंस बने, जैसे देसी गाय के दूध में सोना होने का दावा या कोरोना के इलाज के लिए गोमूत्र के सेवन की सलाह।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर उनके 'बरमूडा' वाले कमेंट पर भी काफी सियासी बवाल मचा था। यही नहीं, एक रैली के दौरान एम्बुलेंस को रास्ता न देने और जादवपुर विश्वविद्यालय की छात्राओं पर की गई उनकी टिप्पणियों ने भी उन्हें आलोचनाओं के घेरे में खड़ा किया था। उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी विवाद हुआ, लेकिन कोलकाता उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए इस मामले को समाप्त कर दिया था।

खड़गपुर में फिर चल पाएगा दिलीप घोष का जादू?

वर्तमान में दिलीप घोष एक बार फिर खड़गपुर सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जो उनकी राजनीतिक कर्मभूमि रही है। संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे पदों पर रहने के बाद अब उनका पूरा ध्यान अपनी सीट को वापस जीतने पर लगा है। निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने अप्रैल 2025 में अपनी पार्टी की सहकर्मी रिंकू मजूमदार के साथ विवाह किया था, जो काफी चर्चा में रहा था। करीब 1.32 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति के मालिक दिलीप घोष आज भी खुद को एक जमीनी कार्यकर्ता ही मानते हैं।

पत्नी रिंकू मजूमदार के साथ दिलीप घोष, फोटो- सोशल मीडिया

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