पारंपरिक कोसा रेशम बुनाई को बढ़ावा देने के लिए ताना-बाना समारोह।
छत्तीसगढ़ के 18 गांवों में 1,100 से अधिक कारीगर।
देवरी गांव की 30 महिलाएं ले रही हाथ की कढ़ाई का प्रशिक्षण।
करमंदा गांव में 20 महिलाओं को सिखाई जा रही कोसा बुनाई।
Raipur Traditional Kosa Silk Weaving: छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कोसा रेशम बुनाई को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड की आजीविका एवं सामाजिक विकास पहल कोसाला ने राजधानी में ताना-बाना समारोह का आयोजन किया। इसी मौके पर कोसाला एक्सपीरियंस सेंटर का शुभारंभ भी हुआ। यह केंद्र कोसा की यात्रा, कारीगर समुदायों के साथ उसके काम और आजीविका से जुड़ी पहलों के असर को करीब से अनुभव करने का मंच है। विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह केवल शिल्प उत्पादों के प्रदर्शन का स्थान नहीं है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कौशल विकास, मूल्य श्रृंखला की मजबूती और बाजार तक पहुँच से पारंपरिक ज्ञान आर्थिक अवसरों में कैसे बदल सकता है।
ताना-बाना समारोह परंपरागत रूप से हर साल दिवाली से पहले चांपा में होता है। यह बुनकरों और कारीगर समुदायों के योगदान को सम्मानित करने वाला आयोजन है। इस बार इसे रायपुर में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में हिंडाल्को के वरिष्ठ नेतृत्व की ओर से सौरभ खेडेकर (निदेशक, कोसाला एवं सीईओ, स्पेशियलिटी एल्युमिना बिजनेस), उन्नीकृष्णन प्रभाकरन (हेड, बिजनेस फाइनेंस, केमिकल्स), संदीप पाटिल (बिजनेस हेड, मुरी) और सुखेंदु घोष (वरिष्ठ उपाध्यक्ष, सीएचआर स्किल डेवलपमेंट) उपस्थित रहे।
राज्य रेशम विभाग, वीवर्स सर्विस सेंटर और राष्ट्रीय हैंडलूम विकास निगम (NHDC) के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया था। समारोह में डॉ. संगीता कापसे की संगीता कला अकादमी की छात्राओं राधिका शर्मा और गीतिका चक्रधर ने लखनऊ घराना शैली में कथक प्रस्तुत किया।
कोसाला लाइवलीहुड एंड सोशल फाउंडेशन एक सेक्शन 8 कंपनी है जिसे वर्ष 2021 में हिंडाल्को की सामाजिक विकास पहल के रूप में स्थापित किया गया। कंपनी का कहना है कि वह छत्तीसगढ़ में कोसा की रीलिंग और बुनाई को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रही है और क्षमता निर्माण, तकनीकी प्रशिक्षण व आजीविका अवसरों के जरिए जांजगीर-चांपा, रायगढ़ और कोरबा जिलों के 18 गाँवों में 1,100 से अधिक कारीगरों और समुदाय के सदस्यों तक पहुँची है। ये आँकड़े कंपनी के हैं और स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हैं।
क्राफ्टिंग स्किल्स, क्रिएटिंग लाइवलीहुड्स' पहल के तहत देवरी गाँव की 30 महिलाएँ फिलहाल हाथ की कढ़ाई का अल्पकालिक प्रशिक्षण ले रही हैं। कंपनी के अनुसार इसका उद्देश्य महिलाओं को व्यावहारिक शिल्प कौशल देना है, ताकि उनके लिए आजीविका के अतिरिक्त अवसर बन सकें।
बुनाई, सीखने और आजीविका का केंद्र' के जरिए महिलाओं को कोसा बुनाई सिखाई जा रही है। स्थानीय ग्राम पंचायत और सरपंच के सहयोग से शुरू इस पहल में 20 महिलाएँ जुड़ी हैं, जिनमें 10 अर्ध-कुशल हैं और 10 पहली बार बुनाई सीख रही हैं।
सौरभ खेडेकर ने कहा कि पारंपरिक शिल्प का संरक्षण और सतत आजीविका के अवसर बनाना समावेशी विकास के महत्वपूर्ण आयाम हैं। उनके अनुसार कोसाला के माध्यम से कंपनी कोसा की मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने के साथ समुदायों को नए कौशल सीखने और स्थायी आजीविका विकसित करने के अवसर दे रही है।
कोसाला लाइवलीहुड एंड सोशल फाउंडेशन की सीईओ नीता शाह ने कहा कि पारंपरिक शिल्प का संरक्षण और सतत आजीविका का सृजन साथ-साथ चलना चाहिए। उनके मुताबिक यदि लोगों को प्रशिक्षण, उपयुक्त सहयोग और बाजार के अवसर मिलें, तो उनकी कला आजीविका का सशक्त माध्यम बन सकती है। कंपनी का कहना है कि उसका प्रयास कोसा बुनाई को केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए व्यावहारिक रोजगार का साधन भी बनाना है।