नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई
केजी हिल्स के जंगल से 711 बीजीएल सेल बरामद
सुरक्षा बलों ने 31 माओवादियों को मार गिराया था
चार हथियार निर्माण इकाइयों को किया नष्ट
डी-माइनिंग अभियान चलाया जाएगा
Bijapur Karregutta Hills : बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों की बड़ी कार्रवाई के बाद अब नक्सलियों के पुराने ठिकानों से उनके छिपाए हथियारों और विस्फोटक सामग्री का जखीरा सामने आने लगा है। कभी माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं की सबसे सुरक्षित पनाहगाह माने जाने वाले कर्रेगुट्टा हिल्स के जंगलों में अब भी नक्सलियों का छिपाया हुआ बारूद मिल रहा है। इसका ताजा उदाहरण 5 नवंबर को सामने आया, जब सुरक्षा बलों ने ताड़ापाला के पास केजी हिल्स के जंगल से 711 बीजीएल सेल बरामद किए।
यह बरामदगी इसलिए भी अहम है, क्योंकि अप्रैल-मई 2025 में कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में 21 दिनों तक चले बड़े नक्सल विरोधी अभियान के बाद भी इस इलाके में छिपाई गई विस्फोटक सामग्री की मौजूदगी सामने आ रही है। यानी जिस इलाके को कभी नक्सलियों का अभेद्य गढ़ माना जाता था, वहां उनके पुराने नेटवर्क और छिपे ठिकानों की तलाश अब भी जारी है।
पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, विश्वसनीय सूचना के आधार पर जिला पुलिस बीजापुर सीआरपीएफ की 196वीं वाहिनी और कोबरा की 204वीं वाहिनी की संयुक्त टीम ने उसूर थाना क्षेत्र के ताड़ापाला एफओबी के आसपास सर्च ऑपरेशन चलाया। इस दौरान सुरक्षा बलों को एफओबी से करीब डेढ़ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में केजी हिल्स के पास जंगल में छिपाकर रखे गए 711 बीजीएल सेल मिले। बरामद सामग्री को निर्धारित सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन करते हुए सुरक्षित कब्जे में लिया गया।
कर्रेगुट्टा हिल्स का महत्व समझने के लिए अप्रैल-मई 2025 में चले ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट को देखना जरूरी है। छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर फैली इन पहाड़ियों को माओवादी संगठन का रणनीतिक केंद्र माना जाता था। यहां से संगठन की गतिविधियां संचालित होने के साथ हथियार निर्माण और प्रशिक्षण जैसी गतिविधियां भी चलती थीं।
21 अप्रैल से 11 मई 2025 तक चले अभियान में सुरक्षा बलों ने 31 माओवादियों को मार गिराया था। इस दौरान 35 हथियार बरामद हुए, 450 आईईडी मिले और 214 बंकरों तथा नक्सली ठिकानों को ध्वस्त किया गया। सबसे अहम बात यह रही कि माओवादियों की चार हथियार निर्माण इकाइयों को भी नष्ट किया गया था।
कर्रेगुट्टा के आसपास का ताड़ापाला इलाका कभी ग्रामीण आबादी वाला क्षेत्र था। लेकिन नक्सलियों का प्रभाव बढ़ने के साथ ग्रामीणों को अपना गांव छोड़ना पड़ा। धीरे-धीरे गांव वीरान होता गया और इस इलाके में माओवादियों की गतिविधियां बढ़ती गईं।
घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और सीमावर्ती भौगोलिक स्थिति इस इलाके को माओवादियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनाने में मददगार रही। यहां उन्होंने कैंप और हथियार निर्माण से जुड़ी इकाइयां स्थापित कर रखी थीं।
ताजा बरामदगी के बाद सुरक्षा एजेंसियों की चिंता इस बात को लेकर है कि कर्रेगुट्टा और आसपास के जंगलों में अभी भी विस्फोटक सामग्री छिपी हो सकती है। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि क्षेत्र में आईईडी और अन्य विस्फोटक मिलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी वजह से आम नागरिकों को कर्रेगुट्टा और आसपास की पहाड़ियों में फिलहाल नहीं जाने की सलाह दी गई है। निर्धारित कार्ययोजना के तहत आगे डी-माइनिंग अभियान चलाया जाएगा।