मुरिया दरबार में पहली बार राष्ट्रपति सोर्स : AI जेनरेट
बस्तर

150 साल पुराने मुरिया दरबार में पहली बार राष्ट्रपति, बस्तर की आदिम जन-संसद में गूंजेगी जनजातीय अस्मिता की आवाज

Muria Darbar 2026: सिरहासार भवन में सजने वाली मुरिया दरबार में कभी राजा के सामने प्रजा अपनी समस्याएं रखती थी। आज उसी मंच पर लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतिनिधियों के बीच संवाद होता है।

अजय श्रीवास्तव, चंदू निर्मलकर

Highlights

  • 23 अक्टूबर को द्रौपदी मुर्मु की ऐतिहासिक मौजूदगी।

  • 1876 में ब्रिटिश अधिकारी मेक जॉर्ज की पहल से शुरू हुई परंपरा।

  • राजा-प्रजा के संवाद का मंच अब राष्ट्रीय सुर्खियों में।

  • राष्ट्रपति की मौजूदगी इस ऐतिहासिक परंपरा।

President Draupadi Murmu in Bastar Muria Darbar: बस्तर की धरती पर 23 अक्टूबर को इतिहास का एक ऐसा अध्याय जुड़ने जा रहा है, जिसकी गूंज देशभर में सुनाई देगी। करीब 150 साल पुरानी परंपरा वाले मुरिया दरबार में पहली बार देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शामिल होंगी। सिरहासार भवन में सजने वाली इस आदिम जन-संसद में कभी राजा के सामने प्रजा अपनी समस्याएं रखती थी। आज उसी मंच पर पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रतिनिधियों के बीच संवाद होता है। राष्ट्रपति की मौजूदगी इस ऐतिहासिक परंपरा को राष्ट्रीय पहचान देने वाला महत्वपूर्ण अवसर होगी।

स्वयं आदिवासी समाज से राष्ट्रपति

खास बात यह है कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारी और स्वयं आदिवासी समाज से आने वाली राष्ट्रपति उस मंच पर पहुंचेंगी, जो बस्तर की जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक नेतृत्व और सामुदायिक संवाद का प्रतीक है। इस बार उत्सुकता केवल उनके आगमन को लेकर नहीं, बल्कि इस बात को लेकर भी है कि बस्तर की परंपरा और यहां के समाज की अपेक्षाएं देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक किस तरह पहुंचेंगी।

विद्रोह के बाद शुरू हुआ संवाद का सिलसिला,नाम दिया गया "मुरिया दरबार"

मुरिया दरबार की शुरुआत का इतिहास 1876 के मुरिया विद्रोह से जुड़ा है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 8 मार्च 1876 को ब्रिटिश प्रशासन के अधिकारी मेक जॉर्ज की पहल पर बस्तर के मांझी, चालकी और पारंपरिक मुखियाओं को एक मंच पर लाने की व्यवस्था की गई थी। इसका उद्देश्य आदिवासी समाज और प्रशासन के बीच संवाद स्थापित करना तथा असंतोष और समस्याओं को सुनने का अवसर देना था।

मुरिया दरबार की परंपरा

रियासतकाल में इस दरबार में राजा के सामने प्रजा अपनी शिकायतें रखती थी। समय बदला, राजशाही समाप्त हुई और लोकतांत्रिक व्यवस्था आई, लेकिन मुरिया दरबार की परंपरा कायम रही। आज इस मंच पर मांझी, चालकी, मुखिया, सिरहा, गुनिया, पुजारी और गायता सहित पारंपरिक समाज के प्रतिनिधियों की भागीदारी होती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है,एक ऐसा मंच, जिसने राजशाही से लोकतंत्र तक का सफर तय किया, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान नहीं खोई।

राष्ट्रपति के सामने क्या होगी बस्तर की बात?

मुरिया दरबार में राष्ट्रपति की मौजूदगी से इस बार आयोजन का महत्व और बढ़ गया है। बस्तर के दूरस्थ गांवों की जरूरतें, जनजातीय समाज की अपेक्षाएं, पारंपरिक संस्थाओं की भूमिका और क्षेत्र के विकास से जुड़े विषय इस ऐतिहासिक अवसर के व्यापक संदर्भ हैं। हालांकि, राष्ट्रपति के सामने किन मांगों को औपचारिक रूप से रखा जाएगा, यह आयोजन के दौरान होने वाले संवाद से स्पष्ट होगा।

यह अवसर बस्तर को अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ अपनी जरूरतों और आकांक्षाओं को राष्ट्रीय स्तर पर सामने रखने का मंच दे सकता है। ऐसे में मुरिया दरबार में होने वाला संवाद और उसमें उठने वाले मुद्दे विशेष महत्व रखेंगे।

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