न रावण दहन, न एक दिन में दशहरा खत्म।
बस्तर में 75 दिन चलता है दशहरा उत्सव।
माड़िया समुदाय के लोग निभाते है अहम भूमिका।
बस्तर के इतिहास से जुड़ी कई अनूठी परंपरा शामिल।
Bastar Dussehra Unique Tradition: दशहरे में आपने रावण दहन देखा होगा, लेकिन क्या कभी ऐसा दशहरा देखा है, जहां आधी रात को विजय रथ ‘चुरा’ लिया जाता है और उसे वापस लाने के लिए राजा को खुद मनुहार करने जाना पड़ता है? बस्तर में दशहरा मनाने का अंदाज ही निराला है। यहां मां दंतेश्वरी की आराधना के बीच निभाई जाने वाली भीतर रैनी और बाहर रैनी की रस्में ऐसी हैं, जिनमें इतिहास, लोकविश्वास और जनजातीय परंपरा एक साथ नजर आते हैं।
बस्तर दशहरा की भीतर रैनी में आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को जगदलपुर से कुम्हड़ाकोट ले जाया जाता है। रात के अंधेरे में रथ का इस तरह निकलना इस परंपरा का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। रथ पर मां दंतेश्वरी का छत्र विराजमान रहता है। माड़िया समुदाय के लोग इस विधान में अहम भूमिका निभाते हैं।
लोकमान्यता के अनुसार, इस रस्म के पीछे राजा और माड़िया समुदाय के बीच नाराजगी का प्रसंग जुड़ा है। कहा जाता है कि एक बार नाराज माड़िया समुदाय के लोग विजय रथ को अपने साथ ले गए थे। रथ वापस पाने के लिए राजा को उनके पास पहुंचकर उन्हें मनाना पड़ा। इसी प्रसंग की स्मृति में रथ को कुम्हड़ाकोट ले जाने की परंपरा चली आ रही है। यही वजह है कि भीतर रैनी को केवल रथ की यात्रा नहीं, बल्कि बस्तर के इतिहास से जुड़ी एक अनूठी रस्म माना जाता है।
भीतर रैनी के बाद आती है बाहर रैनी। इस दिन बस्तर के महाराजा कमलचंद्र भंजदेव कुम्हड़ाकोट पहुंचते हैं और परंपरा के अनुसार माड़िया समुदाय के साथ रस्म में शामिल होते हैं। यहां नवाखानी का विधान होता है। नई फसल के चावल से खीर बनाई जाती है। मां दंतेश्वरी को भोग लगाने के बाद खीर सामूहिक रूप से ग्रहण की जाती है। नवाखानी नई फसल के प्रति कृतज्ञता और सामुदायिक सहभागिता का प्रतीक है। इसके बाद विजय रथ को वापस जगदलपुर लाया जाता है। इस तरह भीतर रैनी में रथ को ले जाने और बाहर रैनी में उसे वापस लाने की परंपरा पूरी होती है।
देश के अनेक हिस्सों में दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत और रावण दहन से जुड़ा है, लेकिन बस्तर में इस पर्व का केंद्र मां दंतेश्वरी और उनसे जुड़ी परंपराएं हैं। करीब 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा में हर रस्म का अपना महत्व है। भीतर रैनी और बाहर रैनी इस महापर्व के ऐसे पड़ाव हैं, जहां जनजातीय समाज की भूमिका, राजपरंपरा और लोकआस्था एक साथ दिखाई देती हैं।
रथ का रात में कुम्हड़ाकोट जाना, नई फसल की खीर का विधान और फिर रथ की वापसी इन रस्मों में बस्तर की सांस्कृतिक पहचान बसती है। यहां दशहरा सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि ऐसी जीवित विरासत है, जिसे पीढ़ियां अपने रीति-रिवाजों के साथ आज भी आगे बढ़ा रही हैं।