

75 दिनों के महापर्व का सबसे खास पड़ाव है मुरिया दरबार।
मांझी-चालकी और जनजातीय प्रतिनिधियों की आवाज बनती है शासन तक पहुंचने का जरिया।
150 सालों से कायम है मुरिया दरबार की परंपरा।
बस्तर दशहरा की उस अनूठी परंपरा।
Bastar Dussehra Muria Darbar Story: कहीं राजा, कहीं प्रजा और बीच में समस्याओं की लंबी फेहरिस्त। लेकिन यह कोई पुरानी रियासत का दृश्य नहीं, बल्कि बस्तर दशहरा की उस अनूठी परंपरा की तस्वीर है, जहां राजशाही की विरासत लोकतंत्र के साथ कदमताल करती है। यहां सजता है मुरिया दरबार, जहां बस्तर के पारंपरिक समाज के प्रतिनिधि अपनी बात रखने के लिए जुटते हैं। यह ऐसा मंच है, जहां सदियों पुरानी परंपरा के बीच जनजातीय समाज की आवाज, उसकी अपेक्षाएं और उसके सवाल केंद्र में रहते हैं।
करीब 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा में मुरिया दरबार का अपना विशिष्ट महत्व है। यह केवल एक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर के सामाजिक जीवन और पारंपरिक व्यवस्था का ऐसा प्रतीक है, जहां समाज और शासन के बीच संवाद की परंपरा आज भी जीवित है। इस बार 23 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित मौजूदगी ने इस ऐतिहासिक आयोजन को और खास बना दिया है।
मुरिया दरबार की पहचान उस परंपरा से जुड़ी है, जिसमें बस्तर रियासत के समय प्रजा को अपनी समस्याएं और शिकायतें राजा के सामने रखने का अवसर मिलता था। समय के साथ राजशाही समाप्त हुई और लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई, लेकिन दरबार का स्वरूप पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। आज भी इस आयोजन में पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व और प्रशासनिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी में सामाजिक मुद्दों पर संवाद होता है।
बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से मांझी, चालकी, मुखिया, सिरहा, गुनिया, पुजारी और गायता जैसे पारंपरिक पदों से जुड़े प्रतिनिधि इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं। उनके लिए मुरिया दरबार अपनी बात रखने, क्षेत्र की समस्याओं को सामने लाने और शासन का ध्यान स्थानीय जरूरतों की ओर आकर्षित करने का महत्वपूर्ण अवसर है।
मुरिया दरबार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1876 के मुरिया विद्रोह से भी जुड़ी बताई जाती है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 8 मार्च 1876 को ब्रिटिश प्रशासन के अधिकारी मेक जॉर्ज की पहल पर बस्तर के मांझी, चालकी और पारंपरिक मुखियाओं को एक मंच पर लाने की व्यवस्था की गई थी। इसके पीछे आदिवासी समाज और प्रशासन के बीच संवाद स्थापित करने तथा असंतोष और समस्याओं को सुनने की मंशा थी।
इसके बाद यह परंपरा बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनती गई। राजपरिवार से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक प्रशासन की भूमिका के बीच मुरिया दरबार ने अपना स्थान बनाए रखा। यही कारण है कि इसे बस्तर की पारंपरिक जन-संवाद व्यवस्था का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
बस्तर के जनजातीय समाज की जिंदगी जंगल, जमीन, परंपराओं और सामुदायिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ी है। ऐसे में मुरिया दरबार का महत्व केवल परंपरा निभाने तक सीमित नहीं रहता। यह क्षेत्रीय समस्याओं, ग्रामीण जरूरतों, जनजातीय संस्कृति और विकास से जुड़े मुद्दों को सामने रखने का अवसर भी है।
इस मंच पर पारंपरिक समाज की भागीदारी यह बताती है कि बस्तर की सामाजिक व्यवस्था में मांझी-चालकी और अन्य पारंपरिक पदों की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, समस्याओं के समाधान और मांगों पर कार्रवाई का स्वरूप संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है।
बस्तर दशहरा को देश के विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में गिना जाता है। करीब 75 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में देवी आराधना, पारंपरिक रस्मों, रथ परिक्रमा और जनजातीय रीति-रिवाजों की अलग-अलग छवियां दिखाई देती हैं। मुरिया दरबार इस उत्सव को एक और पहचान देता है,यहां धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सरोकार भी जुड़ते हैं।
मुरिया, माड़िया, भतरा और डोरला सहित विभिन्न जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक विविधता बस्तर की सामूहिक पहचान का हिस्सा है। इस परंपरा में पारंपरिक नेतृत्व की भागीदारी सामाजिक संबंधों और सामुदायिक संवाद की अहमियत को सामने लाती है।
23 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की प्रस्तावित मौजूदगी मुरिया दरबार के लिए विशेष अवसर है। स्वयं आदिवासी समाज से आने वाली राष्ट्रपति का इस पारंपरिक मंच पर पहुंचना बस्तर की जनजातीय विरासत और उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित करेगा।
सिरहासार भवन में होने वाले इस आयोजन पर इस बार सबकी निगाहें रहेंगी। राष्ट्रपति के सामने कौन-से मुद्दे औपचारिक रूप से रखे जाएंगे और संवाद में किन विषयों को प्राथमिकता मिलेगी, यह आयोजन के दौरान स्पष्ट होगा।
मुरिया दरबार की असली पहचान उसके मंच की भव्यता में नहीं, बल्कि उस परंपरा में है, जो लोगों को अपनी बात कहने का अवसर देती है। बस्तर दशहरा के इस अनूठे पड़ाव में इतिहास भी जीवित है, जनजातीय अस्मिता भी और बदलते समय में संवाद की जरूरत भी। यही वजह है कि मुरिया दरबार बस्तर दशहरा की परंपराओं में एक विशिष्ट स्थान रखता है।