बस्तर दशहरा के लिए जोगी बिठाई रस्म शुरू हो चुकी है।
हल्बा समुदाय के युवक दौलत नौ दिनों तक साधना करेंगे।
वे चार फीट गहरे गड्ढे में पालथी मारकर बैठेंगे।
यह परंपरा बस्तर दशहरा को निर्विघ्न पूरा करने के लिए है।
नवमी के दिन जोगी उठाई रस्म के साथ साधना पूरी होगी।
Bastar Royal Family Dassera Tradition : बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ हर साल नवरात्र के मौके पर अनोखी रस्में निभाई जाती हैं। ऐसी ही एक मुख्य परंपरा जोगी बिठाई की है। सोमवार शाम से यह साधना शुरू हो जाएगी।
ग्राम बड़े आमाबाल के हल्बा समुदाय के युवक दौलत यह भूमिका निभाएंगे। वे लगातार तीसरी बार जोगी बनने जा रहे हैं। यह साधना पर्व को शांतिपूर्ण ढंग से पूरा करने के लिए होती है।
सोमवार शाम को मावली मंदिर में विशेष पूजा होगी। मंदिर की पवित्र तलवार लेकर दौलत सिरहासार भवन पहुंचेंगे। यहाँ चार फीट गहरे गड्ढे में वे आसन ग्रहण करेंगे।
अगले नौ दिनों तक वे इसी गड्ढे में साधना करेंगे। इस दौरान वे सामान्य व्यक्ति नहीं बल्कि विशेष अधिपति माने जाते हैं। नौ दिनों की यह तपस्या बहुत कठिन होती है।
इस परंपरा का इतिहास करीब 600 साल पुराना है। लोक कथाओं के अनुसार रियासत काल में दशहरा में विघ्न आते थे। तब एक अनजान व्यक्ति योगासन में बैठा था।
उस साल पूरा त्योहार बहुत शांति से संपन्न हुआ था। राजा ने इसे ईश्वरीय संकेत माना था। तभी से यह जोगी बिठाई की परंपरा लगातार निभाई जा रही है।
नौ दिन की तपस्या नवमी के दिन पूरी होती है। इस दिन जोगी उठाई की रस्म निभाई जाती है। बस्तर राजपरिवार के सदस्य जोगी की आरती उतारते हैं।
राजा खुद जोगी को गड्ढे से बाहर निकालते हैं। इसके बाद उन्हें उपहार और अनाज भेंट किए जाते हैं। इसे प्राचीन काल का राजकीय कर माना जाता है।