बैलाडीला का लाल पानी (सोर्स: नवभारत)
बस्तर

बैलाडीला का लाल पानी, 45 गांवों की जिंदगी में घुल रहा लाल जहर, 40 साल से ज्यादा का दर्द

Bailadila Red Water Story: ग्रामीणों का आरोप है कि खदानों से निकलने वाला लाल मलबा और पानी उनके खेतों, मवेशियों, जंगलों और जीवन को नुकसान पहुंचा रहा है। यह समस्या नई नहीं है।

अजय श्रीवास्तव, चंदू निर्मलकर

Highlights

  • 45 गांवों के ग्रामीणों की जिंदगी पर संकट का आरोप।

  • खेतों की घटती पैदावार, दूषित जलस्रोत और बीमारियों की आशंका।

  • करोड़ों की योजनाओं के बाद भी स्थायी समाधान का इंतजार।

  • जलस्रोतों में प्रदूषण की प्रमुख वजह।

Chhattisgarh Red Water Story: बैलाडीला के पहाड़ों से निकलने वाला लौह अयस्क देश की औद्योगिक जरूरतों को पूरा करता है, लेकिन इन्हीं पहाड़ों के पीछे बसे आदिवासी गांवों के लिए विकास की यह चमक दशकों पुराने दर्द में बदल गई है। जिन नदी-नालों से कभी ग्रामीण अपनी प्यास बुझाते, मछलियां पकड़ते और खेतों की सिंचाई करते थे, उन्हीं जलस्रोतों में लाल पानी उतरने की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि खदानों से निकलने वाला लाल मलबा और पानी उनके खेतों, मवेशियों, जंगलों और जीवन को नुकसान पहुंचा रहा है। यह समस्या नई नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, वे चार दशक से भी अधिक समय से इस संकट का सामना कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें स्थायी राहत नहीं मिल सकी है।

खदानों से निकला लाल पानी गांवों तक कैसे पहुंचा?

बैलाडीला क्षेत्र में लौह अयस्क का खनन 1960 के दशक में शुरू हुआ। खनन और अयस्क की धुलाई के दौरान निकलने वाले लौहयुक्त महीन कणों तथा मलबे के बहाव को स्थानीय जलस्रोतों में प्रदूषण की प्रमुख वजह माना जाता है। खदान क्षेत्र से बहने वाला लाल पानी नदी-नालों में मिलकर गांवों तक पहुंचने की शिकायतें सामने आती रही हैं। शंखिनी और डंकिनी नदियों सहित इलाके के दूसरे जलस्रोतों में प्रदूषण की समस्या लंबे समय से उठाई जाती रही है।

ग्रामीणों के मुताबिक, तमोड़ी और आसपास के गांवों में चार दशक से अधिक समय से लाल पानी की समस्या बनी हुई है। उनका कहना है कि पहले खेतों में धान और सब्जियां उगती थीं तथा तालपेडू नाले से मछलियां मिलती थीं। बाद में खेतों में लाल पानी आने लगा और जमीन की उत्पादकता प्रभावित होने लगी। जिस पानी और जमीन से परिवारों का पेट भरता था, वही आज उनकी चिंता का कारण बन गए हैं।

यह संकट सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं है। बैलाडीला के आसपास और पहाड़ के दूसरी ओर बसे अनेक गांवों में लाल पानी, सुरक्षित पेयजल की कमी और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं।

45 गांवों में आंदोलन, हजारों ग्रामीणों की जिंदगी प्रभावित

सितंबर 2025 में बीजापुर जिले के 45 गांवों के ग्रामीणों के लामबंद होने की जानकारी सामने आई थी। जून 2025 में गंगालूर क्षेत्र के 38 गांवों के लोगों की परेशानी भी सामने आई थी। इन गांवों में ग्रामीणों ने लाल पानी, पेयजल संकट और खेती पर पड़ रहे प्रभावों को लेकर चिंता जताई थी। बैलाडीला और आसपास के प्रभावित गांवों की आबादी को देखें तो अलग-अलग बस्तियों में रहने वाले हजारों ग्रामीणों के प्रभावित होने का अनुमान है। इनमें किसान, पशुपालक और जंगल पर निर्भर परिवार शामिल हैं।

हैंडपंपों के खराब होने की शिकायतें भी

दंतेवाड़ा और बीजापुर की सीमा पर बसे हुर्रेपल, तिमेनार और एटेपाल जैसे गांवों में पेयजल की कमी तथा हैंडपंपों के खराब होने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। समस्या का दायरा केवल पीने के पानी तक सीमित नहीं है। जब खेतों और नालों में लाल पानी पहुंचने की शिकायत होती है, तो ग्रामीणों की खेती, पशुपालन, भोजन और आय के साधन भी प्रभावित होते हैं। ऐसे में प्रत्येक प्रभावित गांव का सर्वे और वास्तविक आबादी का आकलन करना जरूरी है।

बैलाडीला का लाल पानी

खेतों की उर्वरता पर असर, मवेशियों की मौत और आजीविका का संकट

ग्रामीणों की शिकायत है कि लाल पानी खेतों तक पहुंचने से फसलें प्रभावित होती हैं और कई जगह जमीन की उत्पादकता घट गई है। कमी बीजापुर के पुसनार, हिरोली, करका, दुगाली और डुमीरपालनार जैसे गांवों के संबंध में फसलों को नुकसान, पशुधन की मौत और दूषित जल के इस्तेमाल से ग्रामीणों के बीमार पड़ने की शिकायतें सामने आई हैं।

इस संकट का सबसे कठिन पहलू उन परिवारों की स्थिति है, जिनकी आजीविका खेती और पशुपालन पर निर्भर है। खेत खराब होने का मतलब केवल कम फसल नहीं, बल्कि परिवार के भोजन, आय और भविष्य पर असर भी है। मवेशियों को नुकसान होने पर ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति और कमजोर होती है। ग्रामीणों का कहना है कि खेती और पशुपालन पर संकट आने से उनकी पारंपरिक आजीविका भी प्रभावित हो रही है।

स्वास्थ्य के मामले में भी दूषित पानी को लेकर गंभीर चिंता है। पेट संबंधी बीमारियों, दस्त और त्वचा संबंधी परेशानियों की शिकायतें सामने आती रही हैं। दूषित पानी के लगातार इस्तेमाल से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। इसके बावजूद प्रभावित गांवों में नियमित जल-परीक्षण, स्वास्थ्य जांच और बीमारी के मामलों का विस्तृत आकलन जरूरी है, ताकि ग्रामीणों को सुरक्षित पानी और समय पर इलाज मिल सके।

नदी, जंगल और वन्यजीवों पर भी मंडराता संकट

बैलाडीला के आसपास का जंगल आदिवासी समुदायों के लिए केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। नदी-नालों में मछलियां, जंगल में वन उपज और खेतों में फसलें उनकी रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी हैं। जब जलस्रोतों में खनन का मलबा पहुंचता है, तो उसका असर केवल पानी के रंग तक सीमित नहीं रहता। इससे जलीय जीवन, मिट्टी की गुणवत्ता और पूरे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

तमोड़ी के ग्रामीणों का कहना है कि पहले जिस तालपेडू नाले से वे मछलियां पकड़ते थे, वहां लाल पानी आने के बाद खेतों और मवेशियों को नुकसान होने लगा। ग्रामीणों ने वन्यजीवों पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की बात कही है। यदि जलस्रोतों में प्रदूषण लगातार बना रहता है, तो इसका असर जंगल और गांवों के बीच मौजूद प्राकृतिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।

करोड़ों की पेयजल योजनाएं, लेकिन लाल पानी का स्थायी समाधान कहां?

समस्या के समाधान के लिए पेयजल योजनाओं, हैंडपंपों और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर काम करने की पहल पहले भी सामने आई है। सरकारी दस्तावेजों में दंतेवाड़ा के 32 गांवों के लिए समूह पेयजल योजना, 68 दूरस्थ गांवों में सौर ऊर्जा आधारित दोहरे जल पंप और बीजापुर के 48 गांवों में पेयजल उपलब्ध कराने की योजनाओं का उल्लेख मिलता है। इन योजनाओं के लिए क्रमशः 69.33 करोड़, 5.24 करोड़ और 6.05 करोड़ रुपये की लागत दर्ज की गई थी।

पेयजल उपलब्ध कराने की योजनाएं और लाल पानी के प्रदूषण का स्थायी समाधान दो अलग-अलग बातें हैं। वैकल्पिक जलस्रोत मिलने से पीने के पानी की समस्या कम हो सकती है, लेकिन खेतों, नदी-नालों और पशुधन को हुए नुकसान का आकलन तथा प्रभावित परिवारों को राहत देना भी उतना ही जरूरी है।

ग्रामीणों ने पहले भी बोरवेल और हैंडपंप लगाने में देरी की शिकायत की थी। इससे सवाल उठता है कि योजनाओं का लाभ सभी प्रभावित गांवों तक कितनी तेजी से पहुंच रहा है। यदि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी ग्रामीणों को सुरक्षित पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, तो योजनाओं के क्रियान्वयन और उनकी प्रभावशीलता की समीक्षा जरूरी है।

अप्रैल 2026 में एनएमडीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक अमिताभ मुखर्जी ने आसपास के गांवों के पंचायत प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। कंपनी की ओर से पेयजल, सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा तथा स्थानीय समुदायों के साथ संवाद जारी रखने की बात कही गई। एनएमडीसी ने पहले से किए गए पेयजल और स्वास्थ्य संबंधी कार्यों का भी उल्लेख किया।

हालांकि, ग्रामीणों की शिकायतों और समस्या के लंबे इतिहास को देखते हुए अब केवल सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावों से आगे बढ़कर लाल पानी के स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण, प्रदूषण की नियमित निगरानी और स्थायी समाधान की जरूरत है। जब तक जलस्रोतों में लाल पानी पहुंचने की समस्या नहीं रुकती, तब तक वैकल्पिक पेयजल योजनाएं अधूरी राहत ही साबित हो सकती हैं।

मुआवजे के इंतजार में प्रभावित परिवार

लाल पानी से प्रभावित किसानों को मुआवजा देने का मुद्दा भी वर्षों से उठता रहा है। पर्यावरणीय जनसुनवाई से जुड़े दस्तावेजों में ग्रामीण प्रतिनिधियों ने शिकायत की थी कि कुछ प्रभावित गांवों का सर्वे नहीं हुआ है और कई परिवार लगभग 40 वर्षों से समस्या झेल रहे हैं। जवाब में एनएमडीसी की ओर से कहा गया था कि मुआवजे के संबंध में जिला प्रशासन से चर्चा की जाएगी और प्रशासन की अनुशंसा के बाद भुगतान किया जाएगा।

लेकिन मुआवजे की प्रक्रिया में सर्वे और प्रशासनिक अनुशंसा महत्वपूर्ण कड़ी हैं। जिन ग्रामीणों की जमीन, फसल या पशुधन को नुकसान हुआ है, उनके नुकसान का निष्पक्ष आकलन और समय पर भुगतान जरूरी है। फरवरी 2026 में बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने डुमीरपालनार, तिमेनार, हुर्रेपल और बेचापाल का दौरा कर ग्रामीणों की समस्याएं सुनी थीं। उस दौरान भी उचित मुआवजा नहीं मिलने की शिकायत सामने आई थी।

विकास की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?

बैलाडीला की कहानी में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि एक ओर लौह अयस्क राष्ट्रीय उद्योग और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय ग्रामीण अपने जलस्रोतों, खेतों और आजीविका को लेकर लगातार शिकायत कर रहे हैं। चार दशक से अधिक समय से चले आ रहे संघर्ष और हाल के वर्षों में हुए आंदोलनों के बावजूद ग्रामीणों को स्थायी समाधान का इंतजार है।

अब जरूरत केवल नई पेयजल योजना या आश्वासन की नहीं, बल्कि प्रभावित गांवों का सर्वे, आबादी का आकलन, स्वतंत्र जल एवं मिट्टी परीक्षण, स्वास्थ्य जांच, फसल और पशुधन के नुकसान का आकलन तथा मुआवजे की पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित करने की है। साथ ही खदानों से निकलने वाले मलबे और लाल पानी को नदी-नालों में जाने से रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू करनी होगी।

सवाल सीधा है,जिस बैलाडीला के पहाड़ों से निकलने वाला लोहा देश के विकास को मजबूती देता है, उन्हीं पहाड़ों के आसपास बसे ग्रामीणों को स्वच्छ पानी, उपजाऊ खेत और सुरक्षित जीवन के लिए दशकों तक संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? जब तक इस सवाल का जवाब जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से नहीं मिलता, तब तक बैलाडीला का लाल पानी विकास के दावों और आदिवासी जीवन की वास्तविकता के बीच खड़ी एक गंभीर चुनौती बना रहेगा।

आम आदमी पार्टी के नेता समीर खान बोले,समाधान नहीं तो होगा आंदोलन

आम आदमी पार्टी के प्रदेश संगठन मंत्री एवं बस्तर जोन प्रभारी समीर खान ने लाल पानी की समस्या पर सरकार, जिला प्रशासन और एनएमडीसी को घेरा है। उन्होंने कहा कि “बदलता बस्तर” केवल शहरों के होर्डिंग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गांवों में भी विकास दिखाई देना चाहिए।खान ने बासागुड़ा के आसपास नदी, नालों और पुलिया के पानी के लाल होने की शिकायतों का उल्लेख करते हुए स्वतंत्र प्रयोगशाला से जांच कराने की मांग की।

उन्होंने करीब तीन जिलों में व्यापक सर्वे कराकर पानी में आयरन, भारी धातुओं और अन्य प्रदूषकों की जांच, रिपोर्ट सार्वजनिक करने और खनन अपशिष्ट व जल निकासी की भूमिका तय करने की मांग रखी। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल, स्वास्थ्य शिविर, उचित मुआवजा और ग्रामीण सुविधाएं सुनिश्चित करने की मांग करते हुए चेतावनी दी कि समाधान नहीं हुआ तो बचेली-किरंदुल में आंदोलन, एनएमडीसी का घेराव और चक्काजाम किया जाएगा।

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