NCLT के फैसले के खिलाफ HDFC बैंक (सोर्स- सोशल मीडिया)
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सुभाष चंद्रा को 99.97% कर्ज छूट देने पर फंसा पेच! NCLT के फैसले को चुनौती देने की तैयारी में HDFC बैंक

Subhash Chandra: बैंक के एक प्रवक्ता ने बताया कि HDFC बैंक का स्वीकृत दावा कुल दावों का केवल 3.2 प्रतिशत था। यह लोन सुविधा बैंक को HDFC लिमिटेड और HDFC बैंक के विलय के बाद विरासत में मिली थी।

मनोज आर्या

Subhash Chandra Loan Waiver Case: एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा को व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में बड़ी राहत देने वाले राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के फैसले के खिलाफ एचडीएफसी बैंक अपील करने की तैयारी कर रहा है। बैंक ने गुरुवार को कहा कि वह इस मामले में एनसीएलएटी के समक्ष अपील दायर करने की संभावना पर विचार कर रहा है।

एचडीएफसी बैंक की यह प्रतिक्रिया उस फैसले के बाद आई है, जिसमें एनसीएलटी ने एक ऐसी पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी है, जिसके तहत लगभग 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के बदले केवल 6.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाएगा। यह लेनदारों के लिए लगभग 99.97 प्रतिशत कर्ज छूट (हेयरकट) के बराबर है।

HDFC बैंक के प्रवक्ता ने क्या कहा?

बैंक के एक प्रवक्ता ने बताया कि इस मामले में एचडीएफसी बैंक का स्वीकृत दावा कुल दावों का केवल 3.2 प्रतिशत था। यह लोन सुविधा बैंक को एचडीएफसी लिमिटेड और एचडीएफसी बैंक के विलय के बाद विरासत में मिली थी। उन्होंने आगे कहा कि एनसीएलटी मामले में एचडीएफसी बैंक का स्वीकृत दावा कुल राशि का केवल 3.2 प्रतिशत था।

यह लोन सुविधा पहले एचडीएफसी लिमिटेड द्वारा प्रदान की गई थी और विलय के बाद बैंक को प्राप्त हुई। उन्होंने आगे कहा कि बैंक इस आदेश के खिलाफ एनसीएलएटी में अपील दायर करने के विकल्प पर विचार कर रहा है।

22 हजार करोड़ के बदले सिर्फ 6.25 करोड़

बैंक ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित लोन के लिए आवश्यक प्रावधान पहले ही किए जा चुके हैं और यह खाता विलय प्रक्रिया के हिस्से के रूप में बैंक की बुक में आया था। इससे पहले एनसीएलटी ने सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी थी।

प्रस्ताव के अनुसार, चंद्रा को लेनदारों के लगभग 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के बदले केवल 6.25 करोड़ रुपये का भुगतान करना था, जबकि 25 लाख रुपये प्रक्रिया लागत के लिए निर्धारित किए गए थे।

लेनदारों ने इस योजना का विरोध किया

मामले की सुनवाई के दौरान एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस सहित कई लेनदारों ने इस योजना का विरोध किया था। एनसीएलटी के आदेश में दर्ज एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की दलील के अनुसार, उसका स्वीकृत दावा 1,322.39 करोड़ रुपए था, जबकि प्रस्तावित भुगतान केवल 38.09 लाख रुपए था, जो उसके कुल दावे का लगभग 0.028 प्रतिशत है। कंपनी ने तर्क दिया था कि इतनी मामूली वसूली वाली योजना को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए।

हालांकि, तीसरे सदस्य के रूप में फैसला सुनाते हुए एनसीएलटी के न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) की धारा 114 के तहत इस योजना को मंजूरी दे दी। उन्होंने उन लेनदारों की आपत्तियों को खारिज कर दिया, जिन्होंने कहा था कि वसूली की राशि अत्यंत कम है और योजना व्यवहार्य नहीं है।

पहले विभाजित रह चुका है NCLT का फैसला

गौरतलब है कि इस मामले में पहले एनसीएलटी की दो सदस्यीय पीठ का फैसला विभाजित रहा था। दोनों सदस्यों की अलग-अलग राय के बाद न्यायाधिकरण के अध्यक्ष ने मामले के निस्तारण के लिए नीलेश शर्मा को तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया था।

एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस के नेतृत्व में असहमति जताने वाले लेनदारों ने तर्क दिया था कि प्रस्तावित पुनर्भुगतान योजना "अव्यावहारिक और कानून के विपरीत" है। उनका कहना था कि 22,006 करोड़ रुपए से अधिक के स्वीकृत दावों के मुकाबले केवल 6.25 करोड़ रुपये का भुगतान स्वीकार करना लेनदारों के हितों के खिलाफ होगा।

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