भारतीय रिजर्व बैंक, (सोर्स- सोशल मीडिया) 
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देश पर बढ़ा विदेशी कर्ज, ₹72,00,000 करोड़ के पार पहुंचा आंकड़ा; आम आदमी पर क्या असर?

India Foreign Debt: भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में यह भी जानकारी सामने आई है कि सरकार का विदेशी कर्ज कम हुआ है, जबकि प्राइवेट सेक्टर की विदेशी उधारी में इजाफा हुआ है।

मनोज आर्या

RBI Report On India Foreign Debt: दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारतीय इकोनॉमी काफी बेहतर प्रदर्शन कर रही है। इसी बीच आरबीआई के ताजा आकंड़ों ने भारत के ऊपर कर्ज की नई तस्वीर पेश की है। भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, देश का कुल विदेशी कर्ज 762.8 अरब डॉलर यानी करीब 72.15 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया है। मार्च 2026 तक भारत के विदेशी कर्ज में एक साल पहले के मुकाबले 26.3 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है। हालांकि, भारत पर बढ़ते कर्ज का आंकड़ा इससे भी बड़ा है।

RBI की माने तो भारतीय रुपये के मुकाबले मजबूत अमेरिकी डॉलर ने विदेशी कर्ज की वास्तविक बढ़ोतरी को आशंकि रूप से छिपा दिया। अगल वैल्यूएशन के प्रभाव को हटा दिया जाता है तो विदेशी कर्ज में सिर्फ 26.3 अरब डॉलर नहीं, बल्कि 51 अरब डॉलर की होगी।

जीडीपी की तुलना में भारत पर कर्ज

गौरतलब ही कि किसी भी देश के लिए सिर्फ कर्ज के आंकड़े मायने नहीं रखते, यहां यह भी देखा जाता है कि उसकी इकोनॉमी के मुकाबले कर्ज कितना है। इसी पैमाने पर देखें तो भारत का विदेशी कर्ज जीडीपी के अनुपात से बढ़कर 20.8 प्रतिशत पहुंच गया है, जो एक साल पहले 19.8 प्रतिशत था। यानी आर्थिक विकास के साथ-साथ विदेशी कर्ज में भी इजाफा हो रहा है। लेकिन, राहत की बात यह है कि ये अनुपात अभी भी कई उभरती और विकसति अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले नियंत्रित दायरे में माना जाता है।

भारत पर कैसे बढ़ रहा उधारी?

भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में यह भी जानकारी सामने आई है कि सरकार का विदेशी कर्ज कम हुआ है, जबकि प्राइवेट सेक्टर की विदेशी उधारी में इजाफा हुआ है। नॉन-फाइनेंशियल कॉरपोरेट कंपनियां अकेले कुल विदेशी कर्ज का 36.4 प्रतिशत हिस्सा रखती है। विदेशी बाजारों से अपेक्षाकृत सस्ता फंड जुटाने की वजह से कंपनिया बाहरी उधार का ज्यादा इस्तेमाल कर रही हैं।

आम आदमी पर क्या असर?

विदेशी कर्ज में इजाफा का मतलब यह नहीं है कि देश की अर्थव्यवस्था की संकट की ओर बढ़ रही है। हालांकि, यह एक ऐसा संकेत है जिस पर नजर बनाए रखने की जरूरत है। अगर अमेरीकी मुद्रा मजबूत होती है तो वैश्विक ब्याज दरें हाई लेवल पर पहुंच जाती हैं या विदेशी बाजारों से पैसा लेना काफी महंगा हो जाता है। इस स्थिति में कंपनियों की ऑपरेशनल लागत बढ़ जाता है। लंबे समय के लिए यही दबाव निवेश, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है.

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