नई दिल्ली: मंगलवार को केंद्र सरकार ने अचानक केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को बिहार का राज्यपाल बना दिया। बिहार के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर को केरल भेजा गया है। हालांकि, इसके साथ ही पूर्व केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को मणिपुर, जनरल वीके सिंह को मिजोरम, हरि बाबू को ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया है। इन सभी फैसलों में सबसे ज्यादा चर्चा आरिफ मोहम्मद खान को बिहार लाने को लेकर हो रही है। एक तरह से यह आरिफ मोहम्मद खान का प्रमोशन है।
क्योंकि उन्हें राज्यपाल के तौर पर एक और कार्यकाल मिल गया है। आरिफ मोहम्मद खान देश की उन चंद मुस्लिम शख्सियतों में से एक हैं जिन्हें मौजूदा बीजेपी सरकार में अहमियत मिल रही है। सवाल यह नहीं उठता कि बीजेपी आरिफ मोहम्मद खान को इतना पसंद क्यों करती है, इससे ज्यादा अहम यह है कि उन्हें बिहार क्यों लाया गया है। क्योंकि मोदी-शाह के दौर में पार्टी बिना वजह पत्ता भी नहीं हिलाती।
आरिफ मोहम्मद खान को बिहार लाने के पीछे लोग सबसे पहली वजह यही बता रहे हैं कि खान को राज्यपाल बनाकर बीजेपी राज्य के करीब 17 फीसदी मुसलमानों को लुभाने की कोशिश कर रही है। लेकिन यह तर्क बेहद सतही है। क्योंकि देश के मुसलमान आरिफ मोहम्मद खान को प्रगतिशील मुसलमान मानते हैं जो बीजेपी का समर्थक है। ऐसे में कौन मुसलमान आरिफ मोहम्मद खान की वजह से बीजेपी को वोट देगा। अगर बीजेपी किसी कट्टरपंथी मुसलमान को राज्यपाल बनाती तो शायद यह संभव था कि कुछ प्रतिशत मुसलमान बीजेपी में अपना भविष्य देखते।
आरिफ मोहम्मद खान की इसी प्रगतिशीलता की वजह से उनका राजनीतिक करियर खत्म हो गया। शाहबानो मामले में कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानून बनाने की वजह से वे कांग्रेस छोड़कर विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ चले गए। लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह भी जल्द ही वोट बैंक के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने लगे। इसलिए आरिफ मोहम्मद खान उनके लिए भी अछूत हो गए। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उनके आने से बिहार में कुछ मुसलमान बीजेपी से खुश हो जाएंगे।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी का बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सीटों को लेकर भविष्य में संघर्ष होगा। नीतीश कुमार चाहेंगे कि उनकी पार्टी जेडीयू को सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में टिकट मिले। लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनाव में कुंदरकी की जीत से पहले ही भाजपा लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ और रामपुर जैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर जीत हासिल कर चुकी है। इसके चलते भाजपा चाहेगी कि बिहार में भी उसके उम्मीदवार मुस्लिम बहुल इलाकों में अपना दमखम दिखाएं। आरिफ मोहम्मद खान के बहाने भाजपा यह भी कहेगी कि वह मुसलमानों की दुश्मन नहीं है। यह भी संभव है कि नीतीश कुमार पर दबाव बनाने के लिए ही भाजपा यह कह दे कि वह मुस्लिम सीटों पर भी अपने उम्मीदवार उतारना चाहती है, ताकि भाजपा अन्य सीटों पर अपनी संख्या बढ़ा सके।
केंद्र की भाजपा सरकार की यह मंशा भी हो सकती है कि राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद की मनमानी रोकने के लिए एक चतुर व्यक्ति की जरूरत है। नीतीश कुमार यह काम नहीं कर पा रहे हैं। एक तो वह ढीले पड़ गए हैं और दूसरे वह लालू परिवार के इतने करीब हैं कि इस परिवार के खिलाफ कड़े फैसले नहीं ले पा रहे हैं। आरिफ मोहम्मद खान इस काम में माहिर हैं। केरल में रहते हुए उन्होंने कई बार पीआर विजयन को मुश्किल में डाला था। भाजपा अब उनका इस्तेमाल बिहार में करना चाहेगी।
भाजपा 2025 के विधानसभा चुनाव को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं होगी। वैसे भी बिहार में पिछला चुनाव भाजपा और नीतीश कुमार लगभग हार चुके थे। दूसरी बात यह है कि बिहार में चुनाव के बाद गठबंधन की पार्टियां इधर-उधर हो सकती हैं। इन सबके बीच राज्यपाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। आरिफ मोहम्मद खान उम्रदराज हैं, लेकिन युवा लोगों की तरह सक्रिय नहीं हैं। उनमें संविधान की अपनी इच्छा के अनुसार व्याख्या करने की क्षमता भी है, जो मुश्किल समय में भाजपा के काम आ सकती है।