

Climate Resilient Cities in India: मई में गुरुग्राम समेत कई देश के कई इलाकें गर्मी के कारण आग की भट्टी की तरह तप रहे थे। गुरुग्राम में तापमान आए दिन 44 डिग्री सेल्सियस के पार जा रहा था। इसके ठीक ग्यारह हफ्ते बाद छह अगस्त को भारी बारिश ने गुरुग्राम की कई मुख्य सड़कों और इलाकों को पानी में डुबो दिया।
दोनों घटनाओं ने दिखाया कि गुरुग्राम, जिसका का नाम भारत के सबसे आधुनिक शहरों में से एक में लिया जाता है, जहां कई मल्टी नेशनल कंपनियों के ऑफिस हैं और पूरे देश से लोग यहां काम करने आते हैं। वो शहर न तो गर्मी के लिए तैयार है और न ही बारिश के लिए। मौसम का खतरा तब बड़ी शहरी आपदा बनता है जब शहर उसकी मार झेलने के लिए तैयार नहीं होता है। आइए आपको बताते हैं कि क्यों भारत के हाईटेक शहरों की सड़कें पहली बारिश के बाद ही तलाब में तब्दील हो जाती हैं?
हीटवेव, तेज बारिश, बादल का फटना और चक्रवात अपने आप में प्राकृतिक खतरे हैं। लेकिन इनसे होने वाला नुकसान इस बात पर निर्भर करता है कि शहर इन आपदाओं के लिए कितना तैयार और सुरक्षित है। इसके अलावा किसी शहर में बने घर भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। जैसे घना निर्माण, कमजोर ड्रेनेज, खुली जमीन की कमी, असुरक्षित घर और कमजोर सार्वजनिक सेवाएं खतरे को बढ़ा देती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि, शहरों में आपदा का खतरा सिर्फ मौसम से तय नहीं होता है बल्कि प्लानिंग से भी बनता है। अगर शहर में बारिश के पानी निकलने या जमीन में जाने की सही और पर्याप्त व्यवस्था है, तो भारी बारिश के बाद भी बाढ़ का असर कम हो सकता है। वहीं अगर प्राकृतिक नालों को लगातार छोटा करना, झीलों और बाढ़ वाले इलाकों में निर्माण करना और जमीन को कंक्रीट से ढकना जलभराव का खतरा बढ़ा देता है।
घना निर्माण बारिश के साथ गर्मी के मौसम के लिए भी एक बड़ी समस्या है। घना निर्माण, डामर, खराब वेंटिलेशन और पेड़ों की कमी की वजह से शहर के कई इलाके दिन में गर्मी सोख लेते हैं और रात में भी उसे बनाए रखते हैं। इसका प्रभाव उन लोगों पर अधिक पड़ता है जो गर्म घरों में रहते हैं या बिना पर्याप्त छाया, पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं के बाहर काम करते हैं।
जलवायु परिवर्तन और बिना योजना के शहरी विकास मिलकर भारतीय शहरों की मुश्किल बढ़ा रहे हैं। हीटवेव और तेज बारिश जैसी घटनाएं कई जगह ज्यादा गंभीर होती जा रही हैं। दूसरी ओर शहरों में मिट्टी पेड़ पौधों और पानी के प्राकृतिक क्षेत्रों की जगह सड़के इमारतें और दूसरी सख्त सतहें ले रही हैं। इससे स्थानीय तापमान बढ़ता है और बारिश के पानी को जमीन में जाने की जगह कम मिलती है।
शहरों की कमजोर तैयारी के पीछे प्लानिंग क्षमता की कमी भी एक बड़ी वजह है। 2021 की नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की करीब 7,933 शहरी बस्तियों में से लगभग 65 प्रतिशत के पास मास्टर प्लान नहीं था। राज्य स्तर के प्लानिंग विभागों में चार हजार से भी कम मंजूर टाउन प्लानर पद थे जबकि जरूरत करीब बारह हजार पदों की बताई गई थी।
हालांकि, विशेषज्ञ यह मानते हैं कि किसी शहर के पास सिर्फ मास्टर प्लान होने से समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता है। बाढ़ के मैदान, झीलें ड्रेनेज चैनल और खुली जगहें पहले से चिन्हित करके सुरक्षित करना जरूरी हैं। इसके लिए जोनिंग और बिल्डिंग नियमों को प्रभावी तरीके से लागू करना होगा। अगर सड़क परियोजनाओं इमारतों की मंजूरी और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव बिना व्यापक योजना के किए जाते हैं तो हीट एक्शन प्लान और क्लाइमेट प्लान का असर सीमित रह जाएगा।
शहरी आपदा प्रबंधन को केवल आपदा के समय की तैयारी नहीं माना जा सकता है। इसे शहर के रोजमर्रा के विकास से जोड़ना जरूरी है। बाढ़ के नक्शे के आधार पर यह तय होना चाहिए कि कहां निर्माण नहीं किया जा सकता है और कहां ड्रेनेज क्षमता बढ़ाने की जरूरत है। इसी तरह हीट मैप से छाया पेड़ों वेंटिलेशन और इमारतों के निर्माण से जुड़े जरूरी बदलाव तय किए जा सकते हैं।
बाढ़ और गर्मी से जुड़े उपायों को केवल सलाह या अलग दस्तावेजों तक सीमित रखने से काम नहीं चलेगा। इन्हें शहर की कानूनी विकास योजनाओं और बिल्डिंग नियमों का हिस्सा बनाना होगा। इससे जमीन के इस्तेमाल निर्माण और बुनियादी ढांचे से जुड़े फैसलों में मौसम के खतरे को पहले ही ध्यान में रखा जा सकेगा। इससे भविष्य में होने वाले नुकसान को कम करने के लिए शहर पहले से बेहतर तरीके से तैयार हो सकेगा
शहरों को ऐसे शहरी योजनाकारों और तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरत है जो विकास परियोजनाओं के साथ आपदा जोखिम को भी समझ सकें। योजना बनाते समय यह पता होना चाहिए कि कौन से इलाके और कौन से लोग ज्यादा खतरे में हैं। इसके साथ ही शहरी आपदा प्रबंधन अधिकारियों के पास पर्याप्त कर्मचारी बजट और अलग अलग विभागों के बीच तालमेल कराने की क्षमता होनी चाहिए ताकि योजनाएं कागज से निकलकर जमीन पर लागू हो सकें।
इसके अलावा विशेषज्ञ आपदा से निपटने के लिए नगर निकायों को इंजीनियरिंग पानी स्वास्थ्य परिवहन राजस्व और आपातकालीन सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल पर जोर देते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, शहर में होने वाले निवेश और परियोजनाओं की मंजूरी भी व्यापक शहरी योजना के अनुसार होनी चाहिए। समस्याओं के उपाय के लिए विभागों की जिम्मेदार तय होनी चाहिए। इससे मौसम की अगली बड़ी घटना से पहले तैयारियों की समीक्षा और जरूरी सुधार किए जा सकेंगे।
आपदा आने के बाद राहत देने के बजाय पहले से जोखिम कम करने पर ज्यादा खर्च करना जरूरी है। नगर निकायों को मिलने वाले अनुदान और बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्च को बाढ़ गर्मी और जमीन के इस्तेमाल से जुड़ी योजनाओं के पालन से जोड़ा जा सकता है। शुरुआती चेतावनी मिलने पर पहले से तय कदम भी तुरंत लागू होने चाहिए। इनमें बाहर काम करने के समय में बदलाव अस्पतालों की तैयारी स्कूल बंद करना और यातायात में बदलाव शामिल हैं।
मौसम के खतरे को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है लेकिन उसके असर को कम किया जा सकता है। अगर हर साल वही सड़कें बाढ़ में डूबती हैं और वही इलाके ज्यादा गर्म होते हैं तो समस्या केवल मौसम में नहीं है। ऐसे मामलों में जमीन के इस्तेमाल निर्माण और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे से जुड़े पुराने फैसलों की समीक्षा जरूरी हो जाती है। शहरों को आपदा आने का इंतजार करने के बजाय पहले से तैयारी करनी होगी।