बेटे को मंत्री बनाया तो नेता छोड़ने लगे उपेंद्र कुशवाहा का साथ (फोटो- सोशल मीडिय) 
बिहार

पुत्र मोह में पार्टी स्वाहा! बेटे को मंत्री बनाने से इस्तीफों की झड़ी, कुशवाहा की RLM में छिड़ी बगावत

Bihar की राजनीति में पुत्र मोह में एक पार्टी में अब खुले तौर पर बगावत शुरू हो गई है। RLM चीफ Upendra Kushwaha ने पार्टी के अन्य नेताओं को दरकिनार करते अपने बेटे को NDA सरकार में मिला मंत्री पद दिया।

सौरभ शर्मा

RLM Cheaf Upendra Kushwaha Party Crisis: बिहार की राजनीति में 'पुत्र मोह' ने एक और पार्टी में बगावत की आग लगा दी है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने अपनी पत्नी और जीते हुए विधायकों को दरकिनार कर अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बना दिया। इस फैसले ने पार्टी के भीतर ऐसा भूचाल ला दिया है कि एक साथ सात बड़े नेताओं ने इस्तीफे की झड़ी लगा दी है। समाजवाद की बातें करने वाले कुशवाहा पर अब वंशवाद को बढ़ावा देने का सीधा आरोप लग रहा है, जिससे उनकी पार्टी बिखरने की कगार पर आ गई है।

हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कुशवाहा की पत्नी स्नेहलता सासाराम से विधायक बनीं, जबकि उनकी पार्टी ने एनडीए गठबंधन के तहत कुल चार सीटें जीतीं। सियासी गलियारों में उम्मीद थी कि पत्नी स्नेहलता मंत्री बनेंगी, लेकिन शपथ उनके बेटे दीपक प्रकाश ने ली। हैरानी की बात यह है कि दीपक अभी न तो विधायक हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य, फिर भी उन्हें पंचायती राज विभाग सौंपा गया है। इस फैसले से नाराज होकर प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र कुशवाहा और उपाध्यक्ष जितेंद्र नाथ समेत कई वरिष्ठ पदाधिकारियों ने पार्टी को अलविदा कह दिया है।

'समुद्र मंथन' और बेटे की डिग्री की दलील

अपने फैसले का बचाव करते हुए उपेंद्र कुशवाहा ने बेटे को एक "योग्य कंप्यूटर इंजीनियर" बताया है। उन्होंने कहा कि दीपक कोई असफल छात्र नहीं हैं, उन्होंने कड़ी मेहनत से डिग्री हासिल की है और नौकरी भी की है, इसलिए उन्हें खुद को साबित करने का समय दिया जाना चाहिए। वंशवाद के आरोपों पर उन्होंने दार्शनिक अंदाज में अजीब दलील देते हुए कहा कि समुद्र मंथन में अमृत और विष दोनों निकलते हैं और मैंने पार्टी के लिए यह कठिन निर्णय लिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि इस फैसले से

के आरोप लगेंगे, लेकिन इसे उन्होंने 'विष' मानकर पीने की बात कही है।

राजनीतिक अस्थिरता और टूटता भरोसा

पार्टी छोड़ने वाले नेताओं का कहना है कि उपेंद्र कुशवाहा अक्सर नैतिक मूल्यों की बात करते थे, लेकिन मौका आने पर उन्होंने संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं के बजाय अपने परिवार को चुना। राहुल कुमार ने साफ कहा कि कुशवाहा वंशवाद के जाल में फंस गए हैं। उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक इतिहास भी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 2009 से लेकर अब तक वह कई बार जेडीयू से अलग हुए और वापस मिले। विश्लेषकों का मानना है कि उनकी इस अस्थिरता और अब बेटे को कुर्सी सौंपने के फैसले ने यह धारणा बना दी है कि उनकी पार्टी अब केवल 'पति, पत्नी और बेटे' की बनकर रह गई है।

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