Reason Behind Prashant Kishor Win In Bankipur By Election: बिहार के बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के वोटों की गिनती जारी है। शुरुआती रुझानों में जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर बड़े दावेदार के रूप में उभरे हैं। खबर लिखे जाने तक कुल 21 राउंड की गिनती के बाद पीके 42,169 वोटों के साथ पहले नंबर पर हैं। जबकि, भारतीय जनता पार्टी के नीरज कुमार सिन्हा 30,276 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर हैं। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल की उम्मीदवार रेखा कुमारी 10,309 वोटों के साथ तीसरे पायदान पर हैं। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर विधानसभा का उपचुनाव केवल एक सीट की नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य के लिए भी कई मायने में काफी अहम है।
पिछले साल यानी की 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में जनसुराज पार्टी कुल 238 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। हालांकि, पार्टी के एक भी उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल नहीं रहें। जनसुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर उस समय चुनाव नहीं लड़े थे। उन्होंने पार्टी के उम्मीदवार के लिए चुनावी रणनीति और प्रबंधन की जिम्मेदारी की बात कहते हुए चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। हालांकि, भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा जाने के बाद बांकीपुर में हुए उपचुनाव में 'पीके' ने पूरी दमखम के साथ चुनावी मैदान में खुद उतरा और पिछले तीन दशकों से भाजपा का अभेद्द किला रहा बांकीपुर को फतह करने के करीब पहुंच गए। आइए जानते हैं वो 5 कारण, जिससे नीरज कुमार सिन्हा पर भारी पड़े प्रशांत किशोर।
चुनावी मैदान में दोनों प्रत्याशियों के कद में भारी अंतर देखने को मिला। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर खुद मैदान में थे, तो दूसरी तरफ भाजपा ने बूथ स्तर पर काम करने वाले स्थानीय कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को टिकट दिया था। बांकीपुर की शहरी और शिक्षित जनता के बीच प्रशांत किशोर का व्यक्तित्व और राष्ट्रीय पहचान, नीरज सिन्हा के अपेक्षाकृत नए और कम चर्चित चेहरे पर भारी पड़ गए।
भाजपा नेतृत्व का यह मानना था कि बांकीपुर उनका ऐसा पारंपरिक गढ़ है, जहां से किसी भी प्रत्याशी को उतारने पर जीत पक्की है। आखिरी समय तक टिकट को लेकर बनी असमंजस की स्थिति और प्रत्याशी का अचानक बदला जाना कार्यकर्ताओं में भ्रम की वजह बना। दूसरी ओर, प्रशांत किशोर काफी समय पहले से ही पूरी रणनीति बनाकर मैदान संभाल चुके थे। उनके पहले से बने माहौल और साइकोलॉजिकल बढ़त के आगे भाजपा की पारंपरिक रणनीति धराशायी हो गई।
जन सुराज अभियान के तहत प्रशांत किशोर की लगातार पदयात्राएं, जनता से सीधा संवाद और हर वर्ग तक पहुंचने की रणनीति असरदार साबित हुई। उन्होंने स्थानीय मुद्दों जैसे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और नगर सुधार को प्रमुखता से उठाया। इसके विपरीत, भाजपा प्रत्याशी अपने व्यक्तिगत प्रभाव के बजाय पूरी तरह से पार्टी की पुरानी साख और शीर्ष नेताओं के भरोसे ही चुनाव लड़ते दिखे, जिससे मतदाताओं में उत्साह की कमी नजर आई।
बांकीपुर के शहरी मतदाताओं, विशेषकर युवाओं और मध्यवर्ग के बीच एक नए और मजबूत राजनीतिक विकल्प की चाहत लंबे समय से देखी जा रही थी। प्रशांत किशोर ने खुद को पारंपारिक पार्टी आधारित राजनीति से अलग एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। उनके तथ्यात्मक बयानों, विकास के विजन और विमर्श आधारित राजनीति ने युवाओं को अपनी ओर तेजी से आकर्षित किया।
भाजपा के पास लंबे समय से यह सीट रहने के कारण स्थानीय स्तर पर कुछ हद तक सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकम्बेंसी) भी प्रभावी थी। प्रशांत किशोर ने स्थानीय जनसमस्याओं को आक्रामक तरीके से उजागर किया। जब चुनावी बहस और आमने-सामने के विमर्श की बात आई, तो प्रशांत किशोर की मजबूत संवाद शैली और तथ्यों की पकड़ के सामने भाजपा का स्थानीय संगठन कोई ठोस जवाब पेश नहीं कर सका। वहीं, पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के गुस्से और मीडिल क्लास परिवारों को भाजपा से हुए मोहभंग का भी असर देखने को मिला।
पटना का बांकीपुर विधानसभा सीट अब तक बीजेपी के लिए एक अभेद्द किला रहा है। पहले यह पटना पश्चिम विधानसभा सीट के अंदर आता था। नितिन नबीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा साल 1995 में पहली बार यहां से चुनाव जीते थे। इसके बाद साल 2005 तक वह यहां से चुनाव जीतते रहे। हालांकि, 2005 विधानसभा चुनाव में जीतने के बाद नवीन किशोर सिन्हा का निधन हो गया। इसके बाद साल 2026 में हुए उपचुनाव में नितिन नबीन ने यहां से चुनाव लड़ा और जीतकर विधानसभा पहुंचे।
2008 में परिसीमन के बाद ये पटना पश्चिम विधानसभा बांकीपुर के नाम से अस्तित्व में आया। 2026 से लेकर 2025 में हुए विधानसभा चुनावों तक नितिन नबीन बांकीपुर सीट से जीतते रहे हैं। हालांकि, राज्यसभा जाने के बाद उन्होंने यहां से इस्तीफा दे दिया था।