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सप्तश्रृंगी गढ़ संस्थान के विश्वस्त को लेकर विवाद

गोविंद आर्य
  • स्थानीयों को नजरअंदाज करने का आरोप

कलवन. आदिशक्ति श्री सप्तश्रृंगी निवासिनी देवी संस्थान के ट्रस्टी नियुक्ति प्रक्रिया में स्थानीय ग्रामीणों को नजरअंदाज करने का आरोप स्थानीय निवासियों ने लगाया है. ग्रामीणों के अनुसार बाहरी व्यक्तियों को नियुक्ति से बाहर रखना जरूरी है. नांदुरीगढ़ स्थित सप्तश्रृंगी देवी संस्थान को साढ़े तीन शक्ति पीठों में से आर्धशक्ति पीठ माना जाता है. संस्थान के ट्रस्टी के रूप में स्थानीय ग्रामीणों को मौका देना चाहिए.

इसके लिए उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करने का विचार किया जा रहा है. श्री सप्तश्रृंगी निवासिनी देवी संस्थान के ट्रस्टी के लिए चयन प्रक्रिया नाशिक जिला और सत्र न्यायाधीश की अगुवाई में होती है. सप्तशृंगी गढ़ की परंपरा, त्यौहार, उत्सव, आने वाले श्रद्धालुओं को लेकर स्थानीय ग्रामीणों को जानकारी होती है. इसके बावजूद बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज में स्थानीय लोगों को मौका नहीं मिल रहा है. बाहरी ट्रस्टी सालभर अपने वातानुकूलित कार्यालयों में बैठे रहते हैं और केवल त्यौहारों के दौरान सप्तश्रृंगी गढ़ पर पहुंचकर तस्वीरें निकालकर ढिंढोरा पीटते हैं.

विकास के नाम पर कुछ भी नहीं

हालांकि संस्थान के ट्रस्टियों और स्थानीय ग्राम पंचायत के समन्वय के माध्यम से गढ़ परिसर पर विभिन्न विकास कार्य होने की उम्मीद थी, लेकिन संस्थान के ट्रस्टियों ने हमेशा गांव और ग्रामीणों के विकास कार्यों को लेकर अपनी नीति स्वच्छ नहीं रखी. ट्रस्टियों की लापरवाही के कारण सप्तशृंगी गढ़ पर विकास कार्य नहीं हुए, जबकि संस्थान को ब श्रेणी पर्यटन स्थल का दर्जा मिला हुआ है. सप्तश्रृंगी गढ़ पर फ्यूनिक्युलर ट्रॉली परियोजना के अलावा कोई बड़ा काम नहीं हुआ है.

बाहरी ट्रस्टियों के विरोध में ग्रामीण: गवली

इस बारे में जानकारी देते हुए सप्तश्रृंगी गढ़ के पूर्व सरपंच राजू गवली ने कहा कि पिछले 5 सालों में ट्रस्टियों ने गांव अथवा संस्थान के हित में कोई भी ठोस काम नहीं किया है. न ही आने वाले श्रद्धालुओं की समस्याओं को समझने की कोशिश की है. स्थानीय विश्वस्त होने पर संस्थान व श्रद्धालुओं को ध्यान में रखकर कार्य होगा, जिसे स्थानीय नागरिक अच्छी तरह समझते हैं. इस बार भी स्थानीय ग्रामीणों को नजरअंदाज कर अन्य लोगों की नियुक्ति होने की वजह से इस संस्थान के ट्रस्टियों की नियुक्ति का विरोध हो रहा है.

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