

Middle East Tension: पश्चिम एशिया एक बार फिर महायुद्ध की कगार पर खड़ा नजर आ रहा है। अमेरिकी मीडिया आउटलेट 'सीबीएस न्यूज़' के एक ताजा खुलासे ने दुनिया भर के कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2025 में फ्लोरिडा में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को ईरान के मिसाइल ठिकानों पर हमले के लिए 'खुला लाइसेंस' दे दिया है।
सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने वादा किया है कि यदि इजरायल ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को निशाना बनाता है, तो अमेरिका उसे न केवल कूटनीतिक बल्कि सैन्य सहयोग भी देगा। इसमें इजरायली विमानों के लिए हवाई ईंधन भरने और एयरस्पेस के इस्तेमाल की अनुमति जैसे महत्वपूर्ण सैन्य समर्थन शामिल हैं। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह इजरायल के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं है क्योंकि वे लंबे समय से ईरान के मिसाइल शस्त्रागार को अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते रहे हैं। ईरान के पास वर्तमान में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का सबसे उन्नत जखीरा है जो इजरायल और खाड़ी देशों तक पहुंचने में सक्षम है।
इस भू-राजनीतिक संकट में सबसे अप्रत्याशित मोड़ तब आया जब तालिबान ने इस विवाद में छलांग लगा दी। जिस तालिबान को अमेरिका ने सालों तक अपना कट्टर दुश्मन माना उसी के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने ऐलान किया है कि अगर अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो वे ईरान का समर्थन करेंगे।
यह गठबंधन इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि तालिबान एक सुन्नी समूह है और ईरान शिया बहुल देश जिनके बीच पानी के बंटवारे जैसे मुद्दों पर पुराने विवाद रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 'साझा दुश्मन' अमेरिका के खिलाफ एकजुट होना और खुद को 'मुस्लिम उम्मा' के रक्षक के तौर पर पेश करना तालिबान की इस रणनीति का मुख्य हिस्सा है।
जून 2025 में ईरान और इजरायल के बीच पहले ही 12 दिनों का एक भीषण संघर्ष हो चुका है। यदि अब दोबारा हमला होता है तो लेबनान में हिजबुल्लाह और यमन में हूती जैसे समूह भी इस युद्ध में कूद सकते हैं जिससे स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है। भारत के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि युद्ध की स्थिति में तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव पड़ेगा। इसके अलावा, इस क्षेत्र में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा भी दांव पर लग सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें ईरान और इजरायल की अगली चाल पर टिकी हैं।