

Bangladesh Army Chief Khalilur Rehman Tension: बांग्लादेश में मंगलवार को नई सरकार का गठन हो गया, जिसमें प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने कई नए चेहरों को अपनी कैबिनेट में शामिल किया। इसमें सबसे चर्चा में रहे डॉक्टर खलीलुर्रहमान का है, जिन्हें यूनुस सरकार के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (NSA) के रूप में जाना जाता था और अब बीएनपी सरकार में विदेश मंत्री बनाया गया है।
अमेरिका समर्थक खलीलुर्रहमान की नियुक्ति न केवल ढाका की विदेश नीति में बदलाव का संकेत नहीं देती है, बल्कि देश की आंतरिक राजनीति में भी हलचल पैदा कर सकती है। इसके पीछे उनकी आर्मी चीफ वकार-उज-जमां के साथ पुरानी तनातनी भी एक बड़ा कारण है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मोहम्मद यूनुस के अंतरिम शासन में खलीलुर्रहमान काफी प्रभावशाली रहे और उन्हें अमेरिका का 'प्रतिनिधि' माना जाता रहा। NSA के रूप में कई बार विवादों में रहने वाले खलील अब नई सरकार में सबसे महत्वपूर्ण पदों में से एक पर आसीन हुए हैं।
तारिक रहमान की कैबिनेट में खलीलुर्रहमान का विदेश मंत्री बनना अचानक हुआ और इसे किसी 'संदिग्ध डील' से जोड़कर देखा जा रहा है। अमेरिका-बांग्लादेश ट्रेड डील और बोइंग एयरक्राफ्ट खरीद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले खलील को सांसद न होने के बावजूद 'टेक्नोक्रेट' कोटे से मंत्री पद दिया गया। इस नियुक्ति से ढाका की राजनीतिक गलियारों और बीएनपी में कई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि खलीलुर्रहमान का विदेश मंत्री बनना न केवल हैरत का विषय है, बल्कि यह आर्मी चीफ वकार उज जमां के साथ नई तनातनी की संभावना को भी उजागर करता है।
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में खलीलुर्रहमान और वकार जमां के बीच कई मुद्दों पर खींचतान रही। दोनों अक्सर एक-दूसरे को कमजोर करने की कोशिश करते दिखे। इस विवाद की शुरुआत मई 2025 में हुई, जब खलील ने म्यांमार के लिए रखाइन ह्यूमैनिटेरियन कॉरिडोर बनाने की पहल की। खलीलुर्रहमान इस कॉरिडोर के पक्ष में थे, जबकि जनरल जमां ने इसे 'खूनी कॉरिडोर' कहकर विरोध जताया। खलील के अमेरिकी समर्थित रुख के कारण विवाद और गहरा गया।
खलील और जमां के तनाव को दर्शाता है कि ढाका कैंटोनमेंट में खलीलुर्रहमान की एंट्री पर बैन लगाया गया है। खलील ने लेफ्टिनेंट जनरल कमरुल हसन को चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बनाने की कोशिश की, जिससे जमां को कमजोर करने की योजना थी। हालांकि, जमां ने इस प्रयास को नाकाम किया और खलील के समर्थक अफसरों को आगे नहीं बढ़ने दिया। इस तनातनी के कारण 31 जनवरी 2026 से CGS का पद खाली है।
विदेश मंत्री जैसे प्रभावशाली पद पर खलीलुर्रहमान की नियुक्ति से स्पष्ट है कि वे जनरल जमां के लिए चुनौती बने रहेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि खलील सीधे तौर पर सेना के कामकाज को प्रभावित नहीं कर पाएंगे, लेकिन जमां के लिए वे एक कांटे की तरह रहेंगे। जून 2027 में जमां के रिटायर होने तक, वे आर्मी में अपने वफादार अफसरों को मजबूत करने का प्रयास करेंगे ताकि खलीलुर्रहमान के किसी नए खतरे का सामना किया जा सके।