पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का फूटा गुस्सा, जबरन धर्म परिवर्तन और भेदभाव खत्म करने की उठी मांग

Pakistan Minority Rights March: पाकिस्तान में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस पर प्रदर्शनकारियों ने भेदभाव और जबरन धर्म परिवर्तन खत्म करने समेत 11 सूत्रीय मांगें रखीं।
Minority Rights March
पाकिस्तान में भेदभाव और जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ 11 सूत्रीय मांगें रखींसोर्स- आईएएनएस
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Pakistan Karachi Forced Conversion March: पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव, हिंसा और जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों को लेकर आवाज तेज हो गई है। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस के मौके पर कराची में ‘माइनॉरिटी राइट्स मार्च’ और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने मजार-ए-कायद के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और जबरन धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करने की मांग की।

उन्होंने अंतरधार्मिक विवाह से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों में बदलाव, अल्पसंख्यकों के लिए सरकारी और निजी नौकरियों में 10 प्रतिशत कोटा तथा पूजा स्थलों और संपत्तियों की सुरक्षा की मांग भी उठाई। प्रदर्शनकारियों ने ईशनिंदा कानूनों के कथित दुरुपयोग से सुरक्षा, स्कूलों की किताबों से भेदभावपूर्ण सामग्री हटाने और राष्ट्रीय व प्रांतीय अल्पसंख्यक अधिकार आयोग बनाने की मांग की।

धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करने की मांग

पाकिस्तानी अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जबरदस्ती धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करने और अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादी से जुड़े पर्सनल लॉ (व्यक्तिगत कानूनों) में संशोधन करने की मांग की

ताकि अल्पसंख्यक जीवनसाथी और बच्चों के अधिकारों की रक्षा की जा सके। उन्होंने अपनी 11-सूत्रीय मांगों को स्वीकार करने की भी अपील की, जिसमें जबरदस्ती धर्म परिवर्तन के खिलाफ मजबूत सुरक्षा उपाय और ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग से सुरक्षा शामिल है।

राइट एक्टिविस्ट और अन्य समुदाय के लोग शामिल

इस प्रदर्शन में पाकिस्तान के जाने-माने अधिकार कार्यकर्ता (राइट एक्टिविस्ट) और समुदाय के नेता शामिल हुए, जिनमें शीमा किरमानी, पादरी गजाला शफीक, विनेश आर्य, सज्जल शफीक, नाथन डेनियल और अनवर शेख शामिल थे।

सुप्रिम कोर्ट के फैसले को लागू करने की मांग

अन्य मांगों में सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों में सभी स्तरों पर अल्पसंख्यकों के लिए 10 प्रतिशत कोटा, अल्पसंख्यकों को सफाई और कम वेतन वाली अन्य नौकरियों तक ही सीमित रखने की प्रथा को खत्म करना

अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों और संपत्तियों की सुरक्षा व बहाली शामिल थी। प्रदर्शनकारियों ने रिकॉर्ड को डिजिटल करने और राष्ट्रीय व प्रांतीय अल्पसंख्यक अधिकार आयोग बनाकर सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले को लागू करने की भी मांग की।

'गैर-मुस्लिम' शब्द को हटाने की मांग

उन्होंने स्कूल के सिलेबस और किताबों से भेदभावपूर्ण और नफरत फैलाने वाली सामग्री हटाने की भी मांग की और अल्पसंख्यकों के सम्मान, सहनशीलता, शांति और धार्मिक विविधता पर ज्यादा जोर देने को कहा। प्रदर्शनकारियों ने यह भी मांग की कि संविधान और दूसरे कानूनों में 'गैर-मुस्लिम' शब्द की जगह विशिष्ट धार्मिक पहचानों का इस्तेमाल किया जाए।

पाकिस्तान हर साल 11 अगस्त को 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक दिवस' मनाता है। यह दिन 1947 में संविधान सभा में मोहम्मद अली जिन्ना के उस भाषण की याद में मनाया जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि लोग अपने मंदिरों, मस्जिदों या पूजा के अन्य स्थानों पर जाने के लिए स्वतंत्र हैं, और धर्म, जाति या पंथ के आधार पर राज्य के सामने उनकी स्थिति तय नहीं होगी।

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पूजा-स्थलों पर हमलों का किया जिक्र

पाकिस्तानी अखबार 'डॉन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, "जिन्ना के समान नागरिकता के सिद्धांत और मौजूदा हकीकत के बीच के अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बात इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि ये सुरक्षा उपाय पाकिस्तान के बनने के समय ही तय किए गए थे। धार्मिक अल्पसंख्यकों को आज भी मॉब लिंचिंग, पूजा-स्थलों पर हमलों, जबरन धर्म-परिवर्तन और सामाजिक व आर्थिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।"

'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस' आयोजन करने की मांग

रिपोर्ट में कहा गया है, "धर्म की सुरक्षा के लिए बने कानूनों का इस्तेमाल कभी-कभी झूठे आरोपों के जरिए हथियार के तौर पर किया जाता है, जिसके नतीजे कोर्ट-कचहरी से कहीं आगे तक जाते हैं। भले ही सरकार समानता की गारंटी देती हो, लेकिन सामाजिक भेदभाव और संस्थागत रुकावटें असल में उस गारंटी को कमजोर बना देती हैं। 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस' का आयोजन सिर्फ रस्म-अदायगी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।"

--आईएएनएस

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