

Nato Rift Iran War Trump Allies Conflict: पश्चिम एशिया में जारी ईरान और अमेरिका के बीच का संघर्ष अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन नाटो के भीतर भी दरारें पैदा कर दी हैं। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में अली खामेनेई की मौत के बाद भड़की इस जंग ने पश्चिमी देशों के बीच एक वैचारिक युद्ध छेड़ दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर अपने सहयोगियों की आलोचना की है कि वे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सुरक्षित करने के लिए वाशिंगटन का सैन्य साथ नहीं दे रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन चाहता है कि नाटो के सदस्य देश अपनी नौसैनिक शक्तियां ईरान के खिलाफ तैनात करें लेकिन कई यूरोपीय देश इससे बच रहे हैं। नॉर्वे के उप विदेश मंत्री एंड्रियास क्राविक ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए स्वीकार किया है कि नाटो के भीतर अमेरिका को वह समर्थन नहीं मिल रहा है जिसकी उसे उम्मीद थी। क्राविक के अनुसार, यह संघर्ष अब केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं है बल्कि यह समाजों के भीतर अमेरिका विरोधी भावनाओं को भी भड़का रहा है। नॉर्वे का रुख स्पष्ट है कि इस पूरे संकट का समाधान केवल कूटनीति के जरिए ही निकाला जाना चाहिए।
इस वैश्विक अस्थिरता के बीच, भारत की कूटनीतिक सक्रियता ने दुनिया का ध्यान खींचा है। हाल ही में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अरागची से फोन पर लंबी बातचीत की है जिसमें वर्तमान स्थिति के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। दोनों नेता इस संकट के दौरान निरंतर संपर्क में रहने पर सहमत हुए हैं।
नॉर्वे के उप विदेश मंत्री क्राविक ने भारत के इस संतुलित रुख की सराहना करते हुए नई दिल्ली को एक 'मजबूत वैश्विक आवाज' रार दिया है। उन्होंने कहा कि भारत कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान का पक्षधर रहा है जो इसे इस जटिल संघर्ष में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनाता है। हालांकि भारत सीधे तौर पर मध्यस्थता नहीं कर रहा है लेकिन उसकी मौजूदगी और शांति की अपील वैश्विक स्तर पर काफी वजन रखती है।