

Juvenile Crime Crisis In Bangladesh: बांग्लादेश में नाबालिग बच्चों और किशोरों में बढ़ती हिंसक घटनाओं ने देश को चिंतित कर दिया है। कुमिल्ला जिले में 13 वर्षीय मासूम बच्चे इशायात शाहरीआर अप्रतीम की नृशंस हत्या के बाद सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठे हैं।
द बिजनेस स्टैण्डर्ड की रिपोर्ट के अनुसार इस वारदात ने किशोर अपराध की भयावह स्थिति को उजागर कर दिया है। इस घटना के बाद देश भर में बच्चों की सुरक्षा, पारिवारिक माहौल और कानून व्यवस्था की सीमाओं पर चर्चा छिड़ गई है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड हॉस्पिटल ढाका के डॉक्टर हेलाल उद्दीन अहमद ने चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि किशोरों में हिंसक गैंग कल्चर बहुत तेजी से फैल रहा है और यह गंभीर रूप ले रहा है।
टिकटॉक, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस आक्रामक व्यवहार को बढ़ावा दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर 'कूल' दिखने और जल्दी नाम कमाने के चक्कर में किशोर खतरनाक हिंसक वीडियो बना रहे हैं। इन वीडियो के जरिए ध्यान खींचने की कोशिश बच्चों को गंभीर अपराध के रास्ते पर धकेल रही है।
बच्चों में बढ़ रही यह आक्रामक प्रवृत्ति न केवल उनके भविष्य बल्कि पूरे समाज के लिए खतरा बन चुकी है। केवल पुलिस की सख्ती और दंडात्मक कार्रवाई से इस जटिल समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और सोशल मीडिया के सुरक्षित इस्तेमाल पर विशेष ध्यान देना होगा।
ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ए आई महबूब उद्दीन अहमद के मुताबिक गरीबी और बेरोजगारी मुख्य कारण हैं। स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की बढ़ती संख्या, बाल श्रम और बाल विवाह जैसी कुरीतियां सामाजिक नाकामी दर्शाती हैं।
आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे उचित मार्गदर्शन न मिलने पर असामाजिक तत्वों के बहकावे में आ जाते हैं। जब बच्चों को पढ़ाई और विकास के अवसर नहीं मिलते, तो वे आसानी से अपराध की राह पर चले जाते हैं। ढाका विश्वविद्यालय के अपराध विज्ञान विभाग के अध्यक्ष रेजाउल करीम शोहाग ने भी इस पर बात की।
उन्होंने कहा कि सुरक्षित मनोरंजन और खेलकूद के स्थानों की कमी बच्चों को भटकाने का बड़ा कारण है। सरकार को उन आर्थिक और सामाजिक कारणों को खत्म करना होगा जो बच्चों को आपराधिक गिरोहों में धकेलते हैं। गरीबी मिटाने और स्कूल ड्रॉपआउट रोकने के लिए जमीनी स्तर पर ठोस योजनाएं लागू करना बेहद जरूरी है।
शोधकर्ता शाहजेब महमूद ने बांग्लादेश की वर्तमान किशोर न्याय व्यवस्था की कमियों को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि देश में नाबालिगों के लिए पर्याप्त सुधार गृह और पुनर्वास केंद्र उपलब्ध नहीं हैं।
मौजूदा कानूनी प्रक्रिया बच्चों को सुधारने के बजाय आपराधिक तंत्र की ओर अधिक धकेल देती है। जब तक बच्चों के पुनर्वास और मानसिक परामर्श पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक बदलाव संभव नहीं है।विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार, स्कूल, समाज और पुलिस को मिलकर समन्वित प्रयास करने होंगे।
बच्चों को बचपन से ही सुरक्षित माहौल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार की उम्मीद देना जरूरी है। अगर सभी संस्थाएं सही समय पर कदम उठाएं तो बच्चों को हिंसा की राह पर जाने से रोका जा सकता है। समय रहते किए गए एकीकृत प्रयास ही बांग्लादेश के युवाओं को एक सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं।