पाकिस्तान खुद एक मुसीबत...भारत निभा सकता है युद्ध विराम में अहम भूमिका, इजरायल से उठी मांग

US-Iran War: इजरायली दूत फ़्लुर हसन-नहूम ने कहा है कि पश्चिम एशिया संघर्ष सुलझाने में भारत, पाकिस्तान से बेहतर मध्यस्थ है। जहां इस्लामाबाद की कोशिशें विफल रहीं।
iran War India Mediation
भारत ईरान युद्ध में मध्यस्थता कर सकता है (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Iran War India Mediation: ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशें फिलहाल सफल नहीं हो रही हैं। हाल ही में इस्लामाबाद में एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने भाग लिया, लेकिन युद्ध में किसी समझौते की दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी।

इसी बीच, इजरायल के विदेश मंत्रालय की विशेष दूत फ़्लुर हसन-नहूम ने मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध को लेकर बड़ा बयान दिया है। नहूम ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का समाधान भारत कर सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की तुलना में भारत अधिक सक्षम मध्यस्थ साबित हो सकता है।

कई मोर्चों पर चल रहा युद्ध

उन्होंने बताया कि यह युद्ध शुरू से ही कई मोर्चों पर चल रहा है। 7 अक्टूबर को दक्षिण से हमास ने हमला किया, और अगले दिन उत्तर से ईरान समर्थित समूहों ने भी हमला किया, जिससे स्थिति और जटिल हो गई। उन्होंने दावा किया कि पिछले एक महीने में इजरायल को सैन्य तौर पर महत्वपूर्ण फायदे मिले हैं, जिसमें ईरान की 80% रॉकेट क्षमता को नष्ट करना, उसकी नौसेना को नुकसान पहुंचाना और कई बड़े सैन्य व राजनीतिक नेताओं को निशाना बनाना शामिल है।

पाकिस्तान से बेहतर है भारत

इजरायली विशेष दूत ने कहा कि पाकिस्तान खुद कई आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है, इसलिए उसकी मध्यस्थता सफल होने की संभावना कम है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे देश को परमाणु हथियार नहीं दिए जा सकते, जो विनाश की धमकी देता है। इसके विपरीत, भारत इजरायल का करीबी सहयोगी होने के साथ-साथ सभी पक्षों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखता है, जिससे वह पाकिस्तान की तुलना में बेहतर मध्यस्थ साबित हो सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आगे क्या होगा, यह देखना बाकी है।

भारत ने कब-कब की मध्यस्थता

इतिहास में भारत कई बार मध्यस्थ की भूमिका निभा चुका है। कोरियाई युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका और चीन के बीच संवाद में मदद की और 1953 के समझौते में योगदान दिया। इसके अलावा 1954 के जिनेवा समझौते और 1956 के स्वेज संकट में भी भारत सक्रिय था।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि उस समय का दौर अलग था गुटनिरपेक्ष आंदोलन मजबूत था और दुनिया दो ध्रुवों में बंटी हुई थी। मौजूदा समय में भारत के सामने कई चुनौतियां हैं। किसी एक पक्ष की आलोचना करते हुए भारत निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं रह सकता।

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