

Balochistan Declared Independence From Pakistan: पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान ने हाल ही में खुद को एक आजाद देश घोषित कर दिया है। इसके बाद इसे लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर खुद को बलूचिस्तान का प्रतिनिधि बताने वाले मीर यार बलोच ने दावा किया है कि बलूचिस्तान अब पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। मीर यार बलोच ने कहा कि रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान के रक्षा और सुरक्षा बलों ने प्रांत के लगभग 85 फीसदी हिस्से पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। उन्होंने नए देश का राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और "बलोची फलूस" नाम की नई मुद्रा जारी करने का भी ऐलान किया। साथ ही दुनिया के देशों से बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील की। ऐसे में सवाल आता है कि क्या सिर्फ घोषणा करने देश बन जाता है? एक देश बनने के लिए क्या-क्या जरूरी होता है? और क्या भारत बलूचिस्तान को देश के तौर पर मान्यता देता है?
किसी इलाके का खुद को आजाद घोषित कर देना ही काफी नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय कानून में किसी नए देश को मान्यता मिलने के लिए कई शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। इसलिए केवल झंडा, राष्ट्रगान या नई मुद्रा जारी करने से कोई क्षेत्र अपने आप संप्रभु राष्ट्र नहीं बन जाता। अंतरराष्ट्रीय कानून में 1933 के मोंटेवीडियो कन्वेंशन को काफी अहम माना जाता है।
इसके मुताबिक किसी नए देश के लिए चार बुनियादी शर्तें जरूरी हैं। पहली, वहां स्थायी आबादी हो। दूसरी, उसका स्पष्ट और तय भूभाग हो। तीसरी, वहां ऐसी सरकार हो जो उस इलाके पर वास्तविक नियंत्रण रखती हो। चौथी, वह दूसरे देशों से स्वतंत्र रूप से राजनयिक संबंध बना सके।
मीर यार बलोच का दावा है कि उनके संगठन के पास 85 फीसदी इलाके का नियंत्रण है। लेकिन इस दावे की किसी स्वतंत्र एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है। दूसरी ओर पाकिस्तान की सरकार और सेना अब भी पूरे बलूचिस्तान पर अपना नियंत्रण होने की बात कहती है। सरकारी प्रशासन भी वहां काम कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय किसी भी नए देश के दावे को केवल बयान के आधार पर स्वीकार नहीं करता। वह देखता है कि उस इलाके पर वास्तव में किसका नियंत्रण है। क्या वहां सरकार कानून-व्यवस्था चला रही है? क्या प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था उसके हाथ में है? जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक नया देश बनने का दावा कमजोर माना जाता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून में डिक्लेरेटरी थ्योरी के मुताबिक अगर कोई क्षेत्र नए देश बनने की सभी शर्तें पूरी कर ले, तो वह अपने आप एक देश माना जा सकता है। दूसरे देशों की मान्यता केवल उस स्थिति को स्वीकार करने की औपचारिक प्रक्रिया होती है। यानी मान्यता जरूरी जरूर है, लेकिन देश बनने का आधार केवल वही नहीं है।
हालांकि, दुनिया के ज्यादातर देश कांस्टीट्यूटिव थ्योरी को मानते हैं। इसके मुताबिक कोई नया देश तब तक पूरी तरह संप्रभु नहीं माना जाता, जब तक दूसरे देश उसे औपचारिक रूप से मान्यता न दें। इसी वजह से दुनिया में कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्होंने खुद को आजाद घोषित किया, लेकिन उन्हें वैसी अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली जो एक देश बनाने के लिए जरूरी होती है।
कानूनी तौर पर भारत चाहे तो किसी नए देश को मान्यता दे सकता है। यह हर संप्रभु देश का अधिकार है। लेकिन ऐसा फैसला केवल कानून के आधार पर नहीं लिया जाता। इसमें विदेश नीति, सुरक्षा, रणनीतिक हित और दूसरे देशों के साथ संबंधों को भी ध्यान में रखा जाता है। भारत ने 1971 में बांग्लादेश को तब मान्यता दी थी, जब वहां अलग सरकार बन चुकी थी और उसका जमीन पर प्रभावी नियंत्रण भी था। भारत के मान्यता देने के बाद कई और देशों ने भी बांग्लादेश को मान्यता दी थी। हालांकि बलूचिस्तान की स्थिति फिलहाल इससे अलग मानी जा रही है। इसलिए भारत बलूचिस्तान को मान्यता देने से पहले हर पहलू के बारे में विचार करेगा और फिर कोई फैसले करेगा।
अगर कोई नया देश पूरी अंतरराष्ट्रीय मान्यता चाहता है, तो उसे संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता लेने की कोशिश करनी होती है। इसके लिए सबसे पहले आवेदन देना पड़ता है। फिर मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जाता है, जहां 15 में से कम से कम 9 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। साथ ही पांच स्थायी सदस्य देशों में से कोई भी वीटो नहीं लगा सकता।
अगर सुरक्षा परिषद से मंजूरी मिल जाती है, तो मामला संयुक्त राष्ट्र महासभा में जाता है। वहां मौजूद सदस्य देशों के दो-तिहाई बहुमत से मंजूरी मिलने के बाद ही नया देश संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता पाने की प्रक्रिया काफी लंबी और कठिन होती है।
बलूचिस्तान पाकिस्तान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 44 फीसदी हिस्सा है, लेकिन यहां देश की केवल करीब 6 फीसदी आबादी रहती है। इसके बावजूद यह पाकिस्तान का सबसे संसाधन संपन्न इलाका माना जाता है। यहां प्राकृतिक गैस, सोना, तांबा और कोयले के बड़े भंडार मौजूद हैं।
अरब सागर के किनारे स्थित ग्वादर बंदरगाह बलूचिस्तान में ही है। चीन इसे अपने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का सबसे अहम केंद्र मानता है। यही वजह है कि बलूचिस्तान का मुद्दा केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। इसका असर चीन, भारत, अमेरिका और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति पर भी पड़ सकता है।