

Maulana Fazlur Rehman Slams Pakistan Army: 26 जुलाई को हर साल कारगिल विजय दिवस मनाया जाता है। 1990 में पाकिस्तान ने कारगिल पर कब्जा करने की कोशिश की थी। तब भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय के तहत पाकिस्तानी सैनिकों को भारत की धरती से मार भगाया था। पाकिस्तान के वरिष्ठ नेता और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (F) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तानी सेना पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बिना नाम लिए पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और सैन्य नेतृत्व की आलोचना की। फजलुर रहमान ने कहा कि पाकिस्तान की सेना आज तक देश को यह नहीं बता पाई कि कारगिल युद्ध में उसके कितने सैनिक मारे गए। उन्होंने कहा कि अगर सेना अपने शहीदों का सम्मान करती है तो सबसे पहले उनकी सही संख्या देश के सामने रखनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सैन्य नेतृत्व अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेने के बजाय शहीदों की आड़ में छिपने की कोशिश करता है। फजलुर रहमान के इस बयान से पाकिस्तान में विवाद खड़ा हो गया है।
अपने भाषण में फजलुर रहमान ने कहा कि कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान अपने कई सैनिकों के शव लेने तक के लिए तैयार नहीं था। उनका दावा था कि कई शव भारतीय सेना के पास ही रह गए और भारत ने उनका इस्लामी रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया। उन्होंने कहा कि कर्नल शेर खान का शव भी भारत के दबाव के बाद ही पाकिस्तान ने स्वीकार किया। उनके मुताबिक यह शहीदों का सम्मान नहीं बल्कि उनके साथ अन्याय था।
हाल ही में एक अन्य कार्यक्रम में भी फजलुर रहमान ने पाकिस्तान की सेना पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा कि सेना जनता के टैक्स के पैसों से वेतन लेती है और फिर लोगों से उग्रवादियों के खिलाफ लड़ने की उम्मीद करती है। उन्होंने साफ कहा कि वह कोई निजी लश्कर नहीं बनाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सेना को राजनीति करनी है तो पहले वर्दी उतारकर चुनाव लड़ना चाहिए। तभी पता चलेगा कि जनता उन्हें कितना समर्थन देती है।
मौलाना फजलुर रहमान पाकिस्तान के प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में गिने जाते हैं। वह दिवंगत नेता मुफ्ती महमूद के बेटे हैं, जो 1970 के दशक में खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री रहे थे। पिता के निधन के बाद उन्होंने जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम की कमान संभाली। बाद में पार्टी दो हिस्सों में बंटी और उनके नेतृत्व वाला गुट JUI-F कहलाया। वह सात बार पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के सदस्य रह चुके हैं। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के कई इलाकों में उनकी पार्टी का मजबूत आधार माना जाता है। साथ ही उन्हें लंबे समय से कट्टरपंथी विचारों और अफगान तालिबान के करीबी नेता के रूप में भी देखा जाता रहा है।