अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई।
America Missile Crisis News : हथियारों की अंतहीन होड़ ने सुपरपावर अमेरिका को ऐसे दोराहे पर ला खड़ा किया है, जहां सुरक्षा की कीमत उसके खजाने पर भारी पड़ रही। अरबों डॉलर की मिसाइल डिफेंस प्रणाली THAAD को मजबूत करने का फैसला अब रक्षा विशेषज्ञों के बीच नई चिंता का विषय बन गया है। ईरान और इजरायल के बीच हालिया संघर्ष ने अमेरिकी मिसाइल भंडार की सीमाओं और उसकी भारी-भरकम लागत की पोल खोलकर रख दी है।
अमेरिकी रक्षा कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (THAAD) के इंटरसेप्टर मिसाइलों के उत्पादन को सालाना 96 से बढ़ाकर 400 करने का ऐतिहासिक समझौता किया है। यह फैसला जून 2025 में ईरान-इजरायल युद्ध के कड़वे अनुभवों के बाद लिया गया है। उस 11 दिवसीय संघर्ष में इजरायल को बचाने के लिए अमेरिका ने वैश्विक स्टॉक का 25 प्रतिशत (150 से अधिक मिसाइलें) झोंक दिया था।
इस सुरक्षा कवच की सबसे चौंकाने वाली बात इसकी कीमत है। एक THAAD मिसाइल दागने का खर्च करीब 130 करोड़ रुपए आता है। इजरायल की रक्षा के नाम पर अमेरिका ने महज 11 दिनों में 200 अरब रुपए पानी की तरह बहा दिए। इसके बावजूद ईरान की मिसाइलें इजरायली सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाने में सफल रहीं, जिसे खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी स्वीकार किया है।
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अमेरिका हर साल 400 मिसाइलें खरीदता है तो उसे सालाना 6.2 अरब डॉलर खर्च करने होंगे। यह खर्च सेना के अन्य महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स जैसे- M1E3 Abrams टैंक और पैट्रियट सिस्टम के बजट में कटौती कर सकता है। सबसे बड़ा डर चीन और उत्तर कोरिया को लेकर है। इनके पास हजारों सस्ती मिसाइलें हैं। विशेषज्ञों को डर है कि दुश्मन महज सस्ती मिसाइलें दागकर अमेरिका के महंगे मिसाइल भंडार को खाली करा सकते हैं। इसके अतिरिक्त रूस और चीन की नई हाइपरसोनिक मिसाइलें, जो हवा में दिशा बदलने में सक्षम हैं, THAAD जैसी पुरानी पड़ती तकनीक के लिए काल साबित हो सकती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अमेरिका केवल पैसा खर्च करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगा?