इसलिए सूखे वाले इलाके में आ रही है बाढ़, बरसात वाली जगहों पर पड़ रहा है सूखा

देश में ही नहीं विदेशों में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। साथ ही साथ गर्मी जलचक्र को प्रभावित करने लगी है, जिससे मौसम उग्र हो रहा है। इसीलिए जहां पर पहला सूखा होता था, वहां अब बाढ़ आ रही है और बाढ़ आने वाली जगह पर पहले की अपेक्षा कम बरसात हो रही है।
इसलिए सूखे वाले इलाके में आ रही है बाढ़, बरसात वाली जगहों पर पड़ रहा है सूखा
कांसेप्ट फोटो (सौ.-सोशल मीडिया)
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नई दिल्ली : हमारे देश में जलवायु परिवर्तन का असर कई जगहों पर दिखाई देने लगा है। आप कई क्षेत्रों में ऐसी स्थिति देख रहे होंगे, जैसा पहले कभी नहीं देखा होगा। कहीं पर आवश्यकता से अधिक सूखा पड़ने लगा है, तो वहीं कुछ स्थानों पर बाढ़ की संभावनाएं तेज होती जा रही हैं। यह बदलाव अप्रत्याशित रूप से दिखायी दे रहा है। पिछले कुछ दशकों में यह स्थिति कई गुना बढ़ती जा रही है। पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से बरसात की घटनाएं सामने आई हैं और कई ऐसे इलाके में बाढ़ की स्थिति देखी गई है, जहां पहले कभी इतनी बरसात नहीं होती थी। ऐसी स्थिति में इस तरह की बदलती जलवायु प्रवृत्ति पर विश्लेषकों ने अध्ययन करना शुरू किया है।

मौसम की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि देश में ही नहीं विदेशों में भी जलवायु परिवर्तन का असर दिख रहा है। साथ ही साथ गर्मी जलचक्र को प्रभावित करने लगी है, जिससे मौसम उग्र हो रहा है। इसीलिए जहां पर पहला सूखा होता था, वहां अब बाढ़ आ रही है और बाढ़ आने वाली जगह पर पहले की अपेक्षा कम बरसात हो रही है।

चिंताजनक है मौसम का ये बदलाव,  जलवायु परिवर्तन का असर,

हमारे देश के कई जिलों में चरम जलवायु घटनाओं का स्वरूप बदलते हुए दिख रहा है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कुछ बाढ़ प्रभावित क्षेत्र अब सूखे की चपेट में आने लगे हैं, जबकि सूखे वाली जगहों पर बाढ़ की स्थिति दिखायी दे रही है। विशेशज्ञों का कहना है कि जलवायु की चरम सीमाओं की आवृत्ति, तीव्रता और अप्रत्याशितता हाल के दशकों में चार गुना बढ़ गई है। इसके प्रति अब हमें सावधानी बरतनी होगी।

आईपीई ग्लोबल ईएसआरआई इंडिया का ताजा विश्लेषण

आईपीई ग्लोबल ईएसआरआई इंडिया के ताजा विश्लेषण और मिली जानकारी को देखें तो पता चलेगा कि पिछले दो दशकों में गुजरात के 80 प्रतिशत से अधिक जिलों में भीषण बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। शायद इसी वजह से इस साल भी सौराष्ट्र में विनाशकारी बाढ़ आ गयी। रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि बाढ़ आ जाने से बाढ़ से सूखे की स्थिति में पहुंचे जिलों की संख्या 149 हो गयी है, जबकि देश के 110 जिले सूखे से बाढ़ की स्थिति में पहुंचे हैं।

हमारे देश के दक्षिणी इलाके में यह स्थिति और भयावह हो सकती है। इन इलाकों में आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में सूखे की स्थिति में उल्लेखनीय वृद्धि महसूस की जाने लगी है, जबकि पश्चिमी व मध्य भारत के कुछ हिस्सों में भी यही स्थिति बनती जा रही है। अगर सामान्य तरीके से समझने की कोशिश करें तो जलवायु परिवर्तन के कारण कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य गैसों में वृद्धि हो रही है, जो गर्मी को रोकती हैं और ग्रह को गर्म करती हैं। यह गर्मी जल चक्र को प्रभावित करती है, मौसम के पैटर्न को बदलती है और भूमि की बर्फ को पिघलाने का काम करती है। ये सभी चीजें चरम मौसम को और उग्र कर रही हैं।

अविनाश मोहंती का दावा

ऐसी परिस्थितियों के विश्लेषणकर्ता अविनाश मोहंती का कहना है, ''विनाशकारी जलवायु चरम सीमाओं की वर्तमान प्रवृत्ति, जिसके कारण 10 में 9 भारतीय चरम जलवायु घटनाओं के संपर्क में हैं, पिछली शताब्दी में 0.6 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि का परिणाम है। बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा गुजरात, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और असम के कम से कम 60% जिले एक से अधिक चरम जलवायु घटनाओं के गवाह बने हैं।''

अविनाश मोहंती का दावा है कि चरम सीमाओं की आवृत्ति, तीव्रता चार गुना बढ़ीं है। चरम जलवायु घटनाओं की सीमाओं की आवृत्ति, तीव्रता और अप्रत्याशितता भी हाल के दशकों में चार गुना बढ़ गई है। पंच दशकीय विश्लेषण का उपयोग करते हुए अध्ययन में स्थानिक और लौकिक मॉडलिंग का उपयोग करके 1973 से 2023 तक की 50 वर्षीय अवधि में चरम जलवायु घटनाओं की एक सूची संकलित की गई है, जिस पर रिसर्च जारी है।

चिंताजनक है मौसम का ये बदलाव,  जलवायु परिवर्तन का असर, वायुमंडल के एरोसॉल का असर, अविनाश मोहंती का है दावा, आईपीई ग्लोबल ईएसआरआई इंडिया की रिपोर्ट

जानकारी का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि भारतीय उपमहाद्वीप में सूखे की घटनाएं अधिक गंभीर होती जा रही हैं। इन्हें गर्म लहर वाले दिनों की संख्या में वृद्धि से भी जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि पहले गर्मी के दिनों की संख्या कम होती थी, लेकिन अब धीरे-धीरे यह बढ़ती जा रही है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि 85 फीसदी से अधिक भारतीय जिले बाढ़, सूखा, चक्रवात और ग्रीष्म लहरों से प्रभावित हो रहे हैं। इनमें से 45 फीसदी में बदलाव की प्रवृत्ति देखी जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वायुमंडल में उपस्थित एरोसॉल भारतीय उपमहाद्वीप में सूखे की गंभीरता को 17 फीसदी तक बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं।

क्या हैं वायुमंडल के एरोसॉल

कुछ एरोसोल वायुमंडल का एक प्राकृतिक हिस्सा हैं, जो ज्वालामुखी फटने, समुद्री नमक और जंगली आग से आते हैं। हालांकि, मनुष्य जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, तेल और गैस को जलाकर वायुमंडल में बहुत सारे एरोसोल जोड़ते हैं। ऐसे में एरोसोल वायु प्रदूषण का एक हिस्सा हैं और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है।

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