क्यों वायरल हो रहा है ‘कचौड़ी गली’? जानें इस फोक सॉन्ग का राज- VIDEO
Kachaudi Gali Song: कोक स्टूडियो भारत का नया लोकगीत 'कचौड़ी गली' इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। दरअसल मानसून के समय गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत यानी 'कजरी' का हिस्सा है।
- Written By: मनोज आर्या
Kachaudi Gali Song Banaras: कोक स्टूडियो भारत का नया लोकगीत ‘कचौड़ी गली’ इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। भोजपुरी और अवधी के प्रभाव वाला यह गाना दरअसल मानसून के समय गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत यानी ‘कजरी’ का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत “सिजिया पे लोटे काला नाग कचौड़ी गली सून कैला बलमू” लाइन से होती है। इस गाने के पीछे करीब 200 साल पुरानी एक दर्दभरी प्रेम कहानी छिपी है, जो बनारस की दाल मंडी में रहने वाली एक तवायफ गौहर जान और असलम नाम के व्यक्ति की नाकाम मोहब्बत की दास्तान बयां करती है। गौहर जान को असलम से पहली नजर का प्यार हुआ था, लेकिन एक दिन असलम अचानक लापता हो गया और बाद में पता चला कि वह काम के सिलसिले में मिर्जापुर चला गया था। इसके बाद गौहर जान को जानकारी मिली कि अंग्रेजों ने असलम को रंगून भिजवा दिया है, जिसके विरह के दर्द में यह गीत उपजा। इस गाने की पंक्तियां अंग्रेजों के प्रति उनके गुस्से को भी दर्शाती हैं। इस लोकगीत को ‘गिरमिटिया गीत’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसे गुलाम भारत के दौर में अंग्रेजों द्वारा बंधुआ बनाकर विदेश भेजे गए सस्ते मजदूरों के पलायन और उनके पीछे छूटे परिवारों के दर्द से जोड़कर देखा जाता है।
Kachaudi Gali Song Banaras: कोक स्टूडियो भारत का नया लोकगीत ‘कचौड़ी गली’ इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। भोजपुरी और अवधी के प्रभाव वाला यह गाना दरअसल मानसून के समय गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीत यानी ‘कजरी’ का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत “सिजिया पे लोटे काला नाग कचौड़ी गली सून कैला बलमू” लाइन से होती है। इस गाने के पीछे करीब 200 साल पुरानी एक दर्दभरी प्रेम कहानी छिपी है, जो बनारस की दाल मंडी में रहने वाली एक तवायफ गौहर जान और असलम नाम के व्यक्ति की नाकाम मोहब्बत की दास्तान बयां करती है। गौहर जान को असलम से पहली नजर का प्यार हुआ था, लेकिन एक दिन असलम अचानक लापता हो गया और बाद में पता चला कि वह काम के सिलसिले में मिर्जापुर चला गया था। इसके बाद गौहर जान को जानकारी मिली कि अंग्रेजों ने असलम को रंगून भिजवा दिया है, जिसके विरह के दर्द में यह गीत उपजा। इस गाने की पंक्तियां अंग्रेजों के प्रति उनके गुस्से को भी दर्शाती हैं। इस लोकगीत को ‘गिरमिटिया गीत’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसे गुलाम भारत के दौर में अंग्रेजों द्वारा बंधुआ बनाकर विदेश भेजे गए सस्ते मजदूरों के पलायन और उनके पीछे छूटे परिवारों के दर्द से जोड़कर देखा जाता है।
