Swati Maliwal Rajya Sabha Speech: राज्यसभा में बजट चर्चा के दौरान सांसद स्वाति मालीवाल ने देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक विफलताओं पर जमकर प्रहार किया। उन्होंने निजी स्कूलों को ‘प्राइवेट बिजनेस’ करार देते हुए कहा कि आज शिक्षा मध्यम वर्ग की पसंद नहीं बल्कि मजबूरी बन गई है, जहाँ माता-पिता बच्चों को पढ़ाने के लिए गहने तक गिरवी रख रहे हैं।
स्वाति मालीवाल ने निजी स्कूलों के बढ़ते रसूख और उनकी कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आज शिक्षा एक मुनाफे का धंधा बन चुकी है। उन्होंने सदन को बताया कि प्राइवेट स्कूल न केवल मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते हैं, बल्कि उनका रवैया भी बेहद संवेदनहीन हो चुका है। मालीवाल के अनुसार, स्कूलों का सीधा संदेश होता है “हैसियत नहीं है तो निकल लीजिए”।
उन्होंने आरोप लगाया कि अभिभावकों पर किताबें, जूते और यूनिफॉर्म स्कूल से ही खरीदने का भारी दबाव बनाया जाता है और ‘फालतू फंड’ के नाम पर वसूली की जाती है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि आज छोटे बच्चों के एडमिशन के लिए सांसदों तक को सिफारिशें लगानी पड़ती हैं, जो इस बात का सबूत है कि हमारी पूरी व्यवस्था ही खराब हो चुकी है।
दिल्ली सरकार की ‘शिक्षा क्रांति’ के दावों पर सवाल उठाते हुए मालीवाल ने शाहबाद डेयरी में बने एक सरकारी स्कूल का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि 2020 में करोड़ों की लागत से चार मंजिला इमारत खड़ी की गई, लेकिन निर्माण सामग्री (मटेरियल) इतना घटिया (सबस्टैंडर्ड) था कि छत बच्चों पर गिरने लगी। नतीजतन, 2024 में इस नए स्कूल को ‘डेंजरस’ घोषित कर बंद करना पड़ा, जिससे 5000 बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक सरकारी स्कूल मजबूत नहीं होंगे, तब तक निजी स्कूलों की लूट बंद नहीं होगी।
Swati Maliwal Rajya Sabha Speech: राज्यसभा में बजट चर्चा के दौरान सांसद स्वाति मालीवाल ने देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक विफलताओं पर जमकर प्रहार किया। उन्होंने निजी स्कूलों को ‘प्राइवेट बिजनेस’ करार देते हुए कहा कि आज शिक्षा मध्यम वर्ग की पसंद नहीं बल्कि मजबूरी बन गई है, जहाँ माता-पिता बच्चों को पढ़ाने के लिए गहने तक गिरवी रख रहे हैं।
स्वाति मालीवाल ने निजी स्कूलों के बढ़ते रसूख और उनकी कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आज शिक्षा एक मुनाफे का धंधा बन चुकी है। उन्होंने सदन को बताया कि प्राइवेट स्कूल न केवल मनमाने ढंग से फीस बढ़ाते हैं, बल्कि उनका रवैया भी बेहद संवेदनहीन हो चुका है। मालीवाल के अनुसार, स्कूलों का सीधा संदेश होता है “हैसियत नहीं है तो निकल लीजिए”।
उन्होंने आरोप लगाया कि अभिभावकों पर किताबें, जूते और यूनिफॉर्म स्कूल से ही खरीदने का भारी दबाव बनाया जाता है और ‘फालतू फंड’ के नाम पर वसूली की जाती है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि आज छोटे बच्चों के एडमिशन के लिए सांसदों तक को सिफारिशें लगानी पड़ती हैं, जो इस बात का सबूत है कि हमारी पूरी व्यवस्था ही खराब हो चुकी है।
दिल्ली सरकार की ‘शिक्षा क्रांति’ के दावों पर सवाल उठाते हुए मालीवाल ने शाहबाद डेयरी में बने एक सरकारी स्कूल का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि 2020 में करोड़ों की लागत से चार मंजिला इमारत खड़ी की गई, लेकिन निर्माण सामग्री (मटेरियल) इतना घटिया (सबस्टैंडर्ड) था कि छत बच्चों पर गिरने लगी। नतीजतन, 2024 में इस नए स्कूल को ‘डेंजरस’ घोषित कर बंद करना पड़ा, जिससे 5000 बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक सरकारी स्कूल मजबूत नहीं होंगे, तब तक निजी स्कूलों की लूट बंद नहीं होगी।