क्या शिवसेना में बगावत बन चुकी है परंपरा? 1991 से 2026 तक विद्रोह की पूरी टाइमलाइन- VIDEO
Shiv Sena Split Timeline: महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों अंदरूनी कलह के कारण राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है। एक बार फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
- Written By: मनोज आर्या
Shiv Sena Split Timeline: महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों अंदरूनी कलह के कारण राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है। महाराष्ट्र में एक बार फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। चर्चाओं के मुताबिक शिवसेना यूबीटी के करीब छह बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंपा है, जिससे पार्टी के भीतर एक बार फिर असंतोष की आवाजें तेज हो गई हैं। हालांकि शिवसेना के लिए यह संकट नया नहीं है, क्योंकि पार्टी का इतिहास चुनावी जीत के साथ-साथ बड़े विद्रोहों का भी गवाह रहा है। वर्ष 1966 में बाला साहेब ठाकरे द्वारा स्थापित इस पार्टी में बगावत का सिलसिला करीब तीन दशकों से चला आ रहा है, जिसकी शुरुआत 1991 में छगन भुजबल के विद्रोह से हुई थी जब वे 17 विधायकों के साथ शरद पवार गुट में शामिल हो गए थे। इसके बाद नारायण राणे, गणेश नायक और खुद ठाकरे परिवार से राज ठाकरे ने वैचारिक व व्यक्तिगत मतभेदों के चलते पार्टी का साथ छोड़ दिया था।
इस सिलसिले का सबसे बड़ा और गहरा प्रभाव 2022 में देखने को मिला जब एकनाथ शिंदे ने बहुमत विधायकों और सांसदों के साथ मिलकर पार्टी को दो धड़ों में बांट दिया और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के साथ ही आधिकारिक नाम और तीर-कमान चुनाव चिन्ह हासिल कर लिया। वर्तमान में छह सांसदों के बगावती तेवरों की इस नई चर्चा ने महाराष्ट्र की राजनीति में फिर से पुराना सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिवसेना में बगावत महज एक अपवाद है या फिर यह एक राजनीतिक परंपरा बन चुकी है।
Shiv Sena Split Timeline: महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों अंदरूनी कलह के कारण राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है। महाराष्ट्र में एक बार फिर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। चर्चाओं के मुताबिक शिवसेना यूबीटी के करीब छह बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र सौंपा है, जिससे पार्टी के भीतर एक बार फिर असंतोष की आवाजें तेज हो गई हैं। हालांकि शिवसेना के लिए यह संकट नया नहीं है, क्योंकि पार्टी का इतिहास चुनावी जीत के साथ-साथ बड़े विद्रोहों का भी गवाह रहा है। वर्ष 1966 में बाला साहेब ठाकरे द्वारा स्थापित इस पार्टी में बगावत का सिलसिला करीब तीन दशकों से चला आ रहा है, जिसकी शुरुआत 1991 में छगन भुजबल के विद्रोह से हुई थी जब वे 17 विधायकों के साथ शरद पवार गुट में शामिल हो गए थे। इसके बाद नारायण राणे, गणेश नायक और खुद ठाकरे परिवार से राज ठाकरे ने वैचारिक व व्यक्तिगत मतभेदों के चलते पार्टी का साथ छोड़ दिया था।
इस सिलसिले का सबसे बड़ा और गहरा प्रभाव 2022 में देखने को मिला जब एकनाथ शिंदे ने बहुमत विधायकों और सांसदों के साथ मिलकर पार्टी को दो धड़ों में बांट दिया और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के साथ ही आधिकारिक नाम और तीर-कमान चुनाव चिन्ह हासिल कर लिया। वर्तमान में छह सांसदों के बगावती तेवरों की इस नई चर्चा ने महाराष्ट्र की राजनीति में फिर से पुराना सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिवसेना में बगावत महज एक अपवाद है या फिर यह एक राजनीतिक परंपरा बन चुकी है।
