Parliament Budget Session: संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में विपक्ष के भारी हंगामे और मर्यादा के उल्लंघन पर अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने विपक्षी सांसदों को नसीहत देते हुए कहा कि विरोध का तरीका तर्कपूर्ण होना चाहिए, न कि नारेबाजी और बैनरों के माध्यम से सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाना।
लोकसभा में जारी गतिरोध के बीच अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्षी सदस्यों द्वारा अपनाए गए विरोध के तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सदन में स्पष्ट रूप से कहा कि लोकतंत्र में विरोध की अपनी जगह है, लेकिन इसकी भी एक निश्चित मर्यादा होती है। अध्यक्ष के अनुसार, विरोध हमेशा शब्दों और तर्कों के माध्यम से होना चाहिए, न कि नारेबाजी और बैनर दिखाकर। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असहमति मुद्दों पर होनी चाहिए और वैचारिक मतभेदों को सदन में बोलकर व्यक्त किया जाना चाहिए। अध्यक्ष ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि विरोध केवल आवाज बुलंद करने से नहीं, बल्कि ठोस तर्कों से प्रभावी होता है, और जिस तरह से वर्तमान में बैनरों का उपयोग हो रहा है, वह अनुचित है।
सदन में हंगामे के दौरान ओम बिरला ने उन वरिष्ठ सदस्यों को भी आड़े हाथों लिया जो लंबे समय तक शासन में रहे हैं। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि इतनी लंबी सरकार चलाने और वरिष्ठ होने के बावजूद ये सदस्य सदन की उच्च मर्यादाओं और परंपराओं को तोड़ रहे हैं। उन्होंने सांसदों से पूछा कि क्या अपनी सीट छोड़कर दूसरे सदस्यों की तरफ जाना या आसन के पास जाकर खड़े होना उचित है? उन्होंने विशेष रूप से सत्ता पक्ष की तरफ बैनर लेकर जाने और मंत्रियों के बोलते समय बाधा डालने की परंपरा पर आपत्ति जताई और इसे संसदीय गरिमा के विरुद्ध बताया।
Parliament Budget Session: संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में विपक्ष के भारी हंगामे और मर्यादा के उल्लंघन पर अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने विपक्षी सांसदों को नसीहत देते हुए कहा कि विरोध का तरीका तर्कपूर्ण होना चाहिए, न कि नारेबाजी और बैनरों के माध्यम से सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाना।
लोकसभा में जारी गतिरोध के बीच अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्षी सदस्यों द्वारा अपनाए गए विरोध के तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सदन में स्पष्ट रूप से कहा कि लोकतंत्र में विरोध की अपनी जगह है, लेकिन इसकी भी एक निश्चित मर्यादा होती है। अध्यक्ष के अनुसार, विरोध हमेशा शब्दों और तर्कों के माध्यम से होना चाहिए, न कि नारेबाजी और बैनर दिखाकर। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि असहमति मुद्दों पर होनी चाहिए और वैचारिक मतभेदों को सदन में बोलकर व्यक्त किया जाना चाहिए। अध्यक्ष ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि विरोध केवल आवाज बुलंद करने से नहीं, बल्कि ठोस तर्कों से प्रभावी होता है, और जिस तरह से वर्तमान में बैनरों का उपयोग हो रहा है, वह अनुचित है।
सदन में हंगामे के दौरान ओम बिरला ने उन वरिष्ठ सदस्यों को भी आड़े हाथों लिया जो लंबे समय तक शासन में रहे हैं। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि इतनी लंबी सरकार चलाने और वरिष्ठ होने के बावजूद ये सदस्य सदन की उच्च मर्यादाओं और परंपराओं को तोड़ रहे हैं। उन्होंने सांसदों से पूछा कि क्या अपनी सीट छोड़कर दूसरे सदस्यों की तरफ जाना या आसन के पास जाकर खड़े होना उचित है? उन्होंने विशेष रूप से सत्ता पक्ष की तरफ बैनर लेकर जाने और मंत्रियों के बोलते समय बाधा डालने की परंपरा पर आपत्ति जताई और इसे संसदीय गरिमा के विरुद्ध बताया।