Galgotias University Robot Dog Controversy: गलगोटिया यूनिवर्सिटी इन दिनों एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। हाल ही में दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एआई समिट में यूनिवर्सिटी ने एक चीनी रोबोटिक डॉग को कथित तौर पर ‘मेड इन इंडिया’ बताकर पेश किया था, जिसके बाद भारत सरकार ने सख्त एक्शन लेते हुए उन्हें एक्सपो से बाहर कर दिया। अब सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी के खिलाफ रिसर्च और पेटेंट फाइलिंग के नाम पर करोड़ों रुपये की प्रोत्साहन राशि लेने के गंभीर दावे किए जा रहे हैं। एक एक्स (पूर्व में ट्विटर) यूजर के अनुसार, गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान आईआईटी (IIT) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से भी अधिक संख्या में पेटेंट फाइल कर रहे हैं ताकि सरकार से मिलने वाली 50 करोड़ रुपये से अधिक की प्रोत्साहन राशि का लाभ उठाया जा सके। आंकड़ों के मुताबिक, सभी आईआईटी मिलकर साल में लगभग 803 पेटेंट फाइल करते हैं, जबकि अकेले गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने 1000 से अधिक पेटेंट फाइल किए हैं। आरोप है कि ये पेटेंट केवल फाइल किए जाते हैं लेकिन इन्हें आगे प्रोसीक्यूट नहीं किया जाता, जिससे ये कभी ग्रांट नहीं होते। यह पूरा मामला वास्तविक नवाचार की जगह संख्या बढ़ाकर आर्थिक लाभ कमाने की ओर इशारा करता है, जो शिक्षा और शोध के क्षेत्र में एक गंभीर लापरवाही का विषय हो सकता है।
Galgotias University Robot Dog Controversy: गलगोटिया यूनिवर्सिटी इन दिनों एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। हाल ही में दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एआई समिट में यूनिवर्सिटी ने एक चीनी रोबोटिक डॉग को कथित तौर पर ‘मेड इन इंडिया’ बताकर पेश किया था, जिसके बाद भारत सरकार ने सख्त एक्शन लेते हुए उन्हें एक्सपो से बाहर कर दिया। अब सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी के खिलाफ रिसर्च और पेटेंट फाइलिंग के नाम पर करोड़ों रुपये की प्रोत्साहन राशि लेने के गंभीर दावे किए जा रहे हैं। एक एक्स (पूर्व में ट्विटर) यूजर के अनुसार, गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान आईआईटी (IIT) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से भी अधिक संख्या में पेटेंट फाइल कर रहे हैं ताकि सरकार से मिलने वाली 50 करोड़ रुपये से अधिक की प्रोत्साहन राशि का लाभ उठाया जा सके। आंकड़ों के मुताबिक, सभी आईआईटी मिलकर साल में लगभग 803 पेटेंट फाइल करते हैं, जबकि अकेले गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने 1000 से अधिक पेटेंट फाइल किए हैं। आरोप है कि ये पेटेंट केवल फाइल किए जाते हैं लेकिन इन्हें आगे प्रोसीक्यूट नहीं किया जाता, जिससे ये कभी ग्रांट नहीं होते। यह पूरा मामला वास्तविक नवाचार की जगह संख्या बढ़ाकर आर्थिक लाभ कमाने की ओर इशारा करता है, जो शिक्षा और शोध के क्षेत्र में एक गंभीर लापरवाही का विषय हो सकता है।