कैंसर के मरीजों को अपने घर से निकाल दे रहे हैं लोग: काशी के 'अपना घर आश्रम' में कराह रहे कई बुजुर्ग

Kashi Apna Ghar Ashram: काशी के 'अपना घर आश्रम' से रिश्तों को तार-तार करने वाली सच्चाई आई सामने। बीमारी के बाद अपनों ने ही 70 कैंसर मरीजों को बेसहारा छोड़ा, 49 की मौत पर शव लेने भी कोई नहीं आया।
Cancer Patients Abandoned by Families at Varanasi’s Apna Ghar Ashram, elderly are groaning pain
'अपना घर आश्रम'(सोर्स- AI जेनेरेटेड फोटो)
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Highlights

  • अपना घर आश्रम में 8 साल में पहुंचे 70 बेसहारा कैंसर मरीज

  • 70 में 49 कैंसर मरीजों की हुई मौत

  • दानदाताओं की मदद से बेसहारा कैंसर मरीजों का मुफ्त इलाज

  • पहचान पत्र के अभाव में सरकारी योजनाओं से वंचित लावारिस मरीज

Cancer Patients In Apna Ghar Ashram: देश की धर्मनगरी वाराणसी के 'अपना घर आश्रम' से मानव रिश्तों को तार-तार कर देने वाली एक बेहद दर्दनाक सच्चाई सामने आई है। इस आश्रम में पिछले आठ वर्षों के दौरान कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित ऐसे 70 असहाय मरीज पहुंचे हैं, जिन्हें बीमारी का पता चलते ही उनके अपने ही परिवार वालों ने बेसहारा छोड़कर घर से बाहर निकाल दिया था। इनमें से 49 मरीजों की इलाज के दौरान मौत हो चुकी है। सबसे दुखद बात यह रही कि अपनों की मौत के बाद परिजन उनके शव तक लेने आश्रम नहीं आए।

दानदाताओं की मदद से जारी है मरीजों का मुफ्त इलाज

काशी के इस आश्रम में साल 2018 से लेकर अब तक करीब 70 बेसहारा कैंसर पीड़ित आश्रय लेने आ चुके हैं। आश्रम प्रबंधन अलग-अलग सामाजिक संस्थाओं और सहृदय दानदाताओं की आर्थिक मदद से इन लावारिस लोगों का मुफ्त इलाज करवाता है। वर्तमान में 12 मरीजों का इलाज आश्रम अपने खर्च पर करा रहा है, जबकि 9 लोगों का इलाज अभी जारी है। इन मरीजों में से पांच महिलाएं गर्भाशय (यूट्रस) कैंसर से पीड़ित हैं, दो में ब्रेस्ट कैंसर की पुष्टि हुई है और एक महिला का हाल ही में निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराया गया है।

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एक साल तक कराया इलाज फिर मौत के बाद BHU को सौंप दी लाश

एक दुखद मामले में पिपलानी कटरा की रहने वाली एक मुस्लिम महिला गर्भाशय के कैंसर से गंभीर रूप से पीड़ित थीं। आश्रम ने करीब एक साल तक उनका इलाज कराया, जिस पर लगभग 2.5 लाख रुपये का खर्च आया। आश्रम प्रबंधन ने महिला के परिजनों से कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। आखिरकार एक साल बाद महिला की मौत हो गई। इसके बाद आश्रम ने उनके लावारिस शव को चिकित्सा शिक्षा और पढ़ाई के लिए IMS BHU को दान कर दिया।

मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला का 8 महीने से चल रहा इलाज

करीब आठ महीने पहले रोहनिया क्षेत्र से मानसिक रूप से अस्वस्थ एक महिला को रेस्क्यू कर आश्रम लाया गया था। जब डॉक्टरों ने उनकी चिकित्सकीय जांच की, तो पता चला कि वह कैंसर की गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं। आश्रम प्रबंधन पूरी निष्ठा के साथ अपने खर्चे पर उनका इलाज करा रहा है। हालांकि, महिला की मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण अभी तक उनके सही नाम और स्थायी पते की जानकारी नहीं मिल सकी है, जिसके चलते उनके परिजनों की तलाश लगातार जारी है।

 'अपना घर आश्रम'
'अपना घर आश्रम'(सोर्स- AI जेनेरेटेड फोटो)
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तेजाब पीने से सिकुड़ गई थीं नसें...

आश्रम में आए 45 वर्षीय एक व्यक्ति पेट के कैंसर से पीड़ित थे। डॉक्टरों की गहन जांच में यह बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि मरीज को कभी जबरन तेजाब पिलाया गया था या उन्होंने भूलवश एसिड पी लिया था। इस वजह से उनके पेट की नसें आपस में बुरी तरह चिपक गई थीं। छह महीने तक आश्रम में रखकर उनका ऑपरेशन और इलाज कराया गया, लेकिन स्वास्थ्य में सुधार न होने के कारण अंततः उनकी मृत्यु हो गई।

बेटे की मौत पर नहीं आया पिता, 10 लाख के बीमा के लिए पहुंचा

रामनगर का 35 वर्षीय एक दिव्यांग युवक छह महीने से आश्रम में रहकर कैंसर की बीमारी से जूझ रहा था, लेकिन उसका पिता कभी हाल जानने नहीं आया। उसकी मौत के बाद भी शव लेने कोई नहीं पहुंचा, जिससे शव बीएचयू को दान कर दिया गया। बाद में जब पिता को पता चला कि बेटे के नाम 10 लाख रुपये का जीवन बीमा था, तो वह बीमा राशि पर दावा करने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र मांगने आश्रम और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने लगा। रिश्तों को लेकर ऐसे भी दिन देखने को मिल रहे हैं।

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पहचान पत्र न होने से नहीं मिल पाती सरकारी सुविधाएं

आश्रम के संचालक डॉ. के. निरंजन ने बताया कि ऐसे असहाय और लावारिस मरीजों के इलाज में सबसे बड़ी बाधा पहचान पत्र की होती है। पहचान पत्र न होने के कारण सरकारी अस्पतालों में इनका आधिकारिक रजिस्ट्रेशन तक नहीं हो पाता, जिससे इन्हें सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का मुफ्त लाभ नहीं मिल पाता है। ऐसे में रोटरी क्लब, विभिन्न सामाजिक संस्थाओं और सहृदय समाजसेवियों के आर्थिक सहयोग के दम पर ही आश्रम इन गंभीर मरीजों का इलाज और देखभाल सुनिश्चित कर पाता है।

आश्रम के संचालक डॉ. के. निरंजन का कहना है कि सरकारी तंत्र को ऐसी संस्थाओं में आए मरीजों के उपचार के लिए नियमों में शिथिलता देनी चाहिए। साथ ही साथ ऐसे केन्द्रों में अनाथों व लावारिस लोगों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं के लिए कैंप लगाए जाने चाहिए।

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