मथुरा की 44 साल पुरानी डकैती की सजा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पलटी, दो आरोपी दोषमुक्त

Allahabad High Court Decision: हाईकोर्ट ने पुलिस की कथित बरामदगी, जब्ती प्रक्रिया और गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास पाए। अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा और दो आरोपियों को लाभ मिला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Highlights:

  • मथुरा के गांव में वर्ष 1978 में हुई थी वारदात

  • साल 1982 में मिली थी मामले में सात आरोपियों को सजा

  • अब साक्ष्यों में विरोधाभास पर हाईकोर्ट ने रद्द की सजा

High Court Overturns Conviction: चार दशक से अधिक समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1978 के डकैती के एक मामले में दो जीवित आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की एकल पीठ ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा।

पुलिस की कथित बरामदगी, जब्ती की प्रक्रिया और गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास पाए जाने पर कोर्ट ने वर्ष 1982 में सुनाई गई सजा का आदेश निरस्त कर दिया।

बारात में गए थे गांव के अधिकांश पुरुष

मामला मथुरा जिले के राया थाना क्षेत्र के दूधाधारी गांव (मौजा दीवान कलां) का है। अभियोजन के मुताबिक चार-पांच मार्च 1978 की मध्यरात्रि करीब 10:15 बजे 13 से 14 हथियारबंद बदमाशों ने गांव में धावा बोला था। उस समय गांव के अधिकांश पुरुष लाल सिंह के बेटे की बारात में गए थे। बदमाशों ने सबसे पहले लाल सिंह के घर को निशाना बनाया।

महिलाओं के शोर मचाने पर फायरिंग की और इसके बाद राम सिंह तथा रोशन लाल के घरों में भी लूटपाट की। शिकायत में तीन घरों से सोने-चांदी के आभूषण और छह हजार रुपये नकद लूटे जाने का उल्लेख था। पुलिस का दावा था कि गांव से निकलते समय बदमाशों का सामना पुलिस टीम से हुआ, मुठभेड़ में दो बदमाश घायल हुए और बाद में उनकी मौत हो गई। सात आरोपियों को गिरफ्तार कर लूट का सामान बरामद करने की बात भी कही गई थी।

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बरामदगी और गवाही पर उठे गंभीर सवाल

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि शिकायत में करीब 52 सोने के आभूषण, 72 चांदी के सामान और छह हजार रुपये की लूट का जिक्र था, जबकि पुलिस ने सात आरोपियों से केवल पांच सोने की अंगूठियां और 300 रुपये की बरामदगी दिखाई। बाकी सामान के संबंध में अभियोजन कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका।

इसके अलावा जब्ती और बरामदगी के दस्तावेजों पर गवाहों के हस्ताक्षर नहीं कराए जाने की बात भी जांच अधिकारी ने जिरह में स्वीकार की। घटना के बाद थाने पहुंचने और रिपोर्ट दर्ज कराने के समय को लेकर गवाहों के बयानों में भी अंतर मिला। बचाव पक्ष ने यह तथ्य भी रखा कि इसी घटना से जुड़े आर्म्स एक्ट और पुलिस पर हमले के मुकदमे में आरोपियों को 1979 में ही बरी किया जा चुका था।

सात में से पांच आरोपियों की हो चुकी है मौत

ट्रायल कोर्ट ने 28 जनवरी 1982 को सातों आरोपियों को दोषी ठहराया था। चंद्रपाल को धारा 395/397 आईपीसी में आठ वर्ष और जसवंत को धारा 395 आईपीसी में सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील लंबित रही। इस दौरान पांच आरोपियों केशव देव, रेशम सिंह, ऊदल, बच्चन और रामचरण की मृत्यु हो गई, जिससे उनके विरुद्ध अपील समाप्त कर दी गई थी।

शेष जसवंत और चंद्रपाल की अपील पर फैसला सुनाते हुए इलाहबाद हाईकोर्ट ने अभियोजन की कहानी को प्रमाणित नहीं माना और दोनों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 437-ए के तहत दोनों को 50 हजार रुपये के व्यक्तिगत बांड और जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया।

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